राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम फैसला देते हुए कहा कि अवैध खनन के मामले में जब्त वाहन को केवल आपराधिक कार्यवाही खत्म होने के आधार पर अपने आप रिहा नहीं किया जा सकता। खनन विभाग की ओर से शुरू की गई जब्ती की कार्यवाही और मोटर वाहन अधिनियम के तहत चलने वाली आपराधिक कार्यवाही अलग-अलग हैं। वाहन की रिहाई का फैसला खनन विभाग की कार्यवाही को ध्यान में रखने के बाद ही किया जा सकता है।

मामले में याचिकाकर्ता का वाहन मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत दर्ज शिकायत में जब्त किया गया। वाहन चालक ने अपना अपराध स्वीकार किया था। हालांकि, उसे अपराधियों की परिवीक्षा अधिनियम का लाभ देते हुए रिहा कर दिया गया। मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया कि यदि वाहन किसी अन्य मामले में आवश्यक नहीं है तो उसे रिहा किया जा सकता है।

याचिकाकर्ता का कहना था कि मजिस्ट्रेट के आदेश के बावजूद पुलिस ने वाहन रिहा नहीं किया। पुलिस का कहना था कि वाहन कथित तौर पर अवैध खनिज के परिवहन में इस्तेमाल हुआ और उसके खिलाफ खनन विभाग के समक्ष जब्ती की कार्यवाही लंबित है।

मामले की सुनवाई जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू ने की।

हाईकोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने वाहन को बिना शर्त रिहा करने का आदेश नहीं दिया, बल्कि रिहाई इस शर्त के साथ थी कि वाहन किसी अन्य मामले में आवश्यक न हो। मजिस्ट्रेट के समक्ष केवल मोटर वाहन अधिनियम के तहत दर्ज शिकायत थी और खनन विभाग से कोई रिपोर्ट भी नहीं मंगाई गई।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मोटर वाहन अधिनियम और खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत चलने वाली कार्यवाहियां अलग-अलग हैं। इसलिए खनन विभाग द्वारा शुरू की गई जब्ती की कार्यवाही का वाहन की रिहाई पर सीधा असर पड़ेगा।

कोर्ट ने कहा,

“वाहन की रिहाई खनन विभाग द्वारा शुरू की गई जब्ती की कार्यवाही के अधीन है। मजिस्ट्रेट वाहन की रिहाई पर कोई आदेश तभी पारित कर सकता है जब वह खनन विभाग की रिपोर्ट पर विचार कर ले।”

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई आदेश या आवेदन मौजूद नहीं है, जिस पर मजिस्ट्रेट ने खनन विभाग की रिपोर्ट लेने के बाद विचार किया हो। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने केवल मोटर वाहन अधिनियम के तहत दर्ज शिकायत का निपटारा किया था, जिसमें वाहन चालक को दोषी पाया गया।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा किया। अदालत ने याचिकाकर्ता को मजिस्ट्रेट के समक्ष वाहन की रिहाई के लिए नई अर्जी दाखिल करने की छूट दी। साथ ही मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वह खनन विभाग से रिपोर्ट मंगाने के बाद उस अर्जी पर कानून के मुताबिक फैसला करे।

फैसले का साफ संदेश है कि अवैध खनन से जुड़ी जब्ती की कार्यवाही आपराधिक मुकदमे के नतीजे से स्वतः खत्म नहीं होती और जब्त वाहन की रिहाई के लिए खनन विभाग की कार्यवाही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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