शहर के मास्टर प्लान के तहत सड़क निर्माण और चौड़ीकरण के लिए आवासीय संपत्तियों को गिराने के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की संपत्ति को हटाने या गिराने से पहले उसके मालिकाना हक के दावे और आपत्तियों की जांच करना तथा उसे सुनवाई का उचित अवसर देना जरूरी है। बिना विधि सम्मत प्रक्रिया अपनाए किसी को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस अनूप कुमार ढांड की पीठ ने मामले में संबंधित विभाग के उच्च अधिकारियों की एक समिति गठित करने का निर्देश दिया।

समिति सभी याचिकाकर्ताओं के मालिकाना हक से जुड़े दावों और शिकायतों की जांच करेगी तथा उन्हें सुनवाई का अवसर देकर उनके अभ्यावेदनों पर निर्णय करेगी। समिति का गठन 15 दिन के भीतर किया जाना है।

मामला श्रीगंगानगर में मास्टर प्लान के अनुसार सड़क निर्माण और चौड़ीकरण के लिए आवासीय संपत्तियों को तोड़े जाने की आशंका से जुड़ा है।

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए कहा था कि वे संबंधित संपत्तियों के वैध मालिक या कब्जाधारी हैं लेकिन राज्य की ओर से बिना सुनवाई का अवसर दिए और बिना मुआवजा दिए उन्हें संपत्ति से हटाने की कार्रवाई की जा रही है।

वहीं राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि मास्टर प्लान को लागू करने के लिए संबंधित संपत्तियों की आवश्यकता है।

सरकार ने याचिकाकर्ताओं को अतिक्रमणकारी बताते हुए कहा कि उनके पास संपत्ति पर वैध स्वामित्व या अधिकार साबित करने वाले पर्याप्त दस्तावेज नहीं हैं।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि शहर के विकास और सौंदर्यीकरण के लिए मास्टर प्लान के अनुसार सड़क विस्तार का काम बाधित नहीं होना चाहिए। हालांकि, जिन लोगों की संपत्तियां इस कार्रवाई की जद में आ रही हैं उन्हें निष्पक्ष सुनवाई का अवसर देना भी उतना ही जरूरी है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मास्टर प्लान शहरों और कस्बों के सुनियोजित विकास के लिए भविष्य की दिशा तय करने वाला नीति दस्तावेज है। इसे किसी व्यक्ति विशेष के हित में मनमाने तरीके से निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009 में अतिक्रमण रोकने और हटाने के लिए कई प्रावधान हैं लेकिन नगर निकायों को कार्रवाई करने से पहले संबंधित व्यक्ति या प्रतिष्ठान को नोटिस देना आवश्यक है।

अनुच्छेद 21 का हवाला

हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 और संपत्ति से वंचित किए जाने से पहले अपनाई जाने वाली विधि सम्मत प्रक्रिया पर जोर दिया।

अदालत ने कहा कि राज्य द्वारा किसी नागरिक को उसकी संपत्ति से वंचित करने से पहले उचित नोटिस और सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि समिति की जांच में किसी व्यक्ति का संपत्ति पर वैध मालिकाना हक स्थापित होता है, लेकिन जनहित में सड़क निर्माण या चौड़ीकरण के लिए वही संपत्ति लेना आवश्यक है तो संबंधित व्यक्ति को मुआवजा देने के संबंध में निर्णय लिया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने इसी आधार पर संबंधित विभाग को समिति गठित कर सभी याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का अवसर देने और उनके दावों पर कानून के अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया।

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