नीलामी में भूखंड हासिल करने वाले सफल बोलीदाताओं को कब्जा नहीं सौंप पाने पर राजस्थान हाईकोर्ट ने जोधपुर नगर निगम की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जताई।

हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी संस्था का काम ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे नागरिकों को मुकदमेबाजी के लिए मजबूर होना पड़े। निगम की लापरवाही, जरूरी रिकॉर्ड के रखरखाव में कमी और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई नहीं किए जाने के कारण नीलामी में भूखंड हासिल करने वाले लोगों को परेशानी उठानी पड़ी।

जस्टिस अनूप कुमार ढांड की पीठ चार भूखंडों से जुड़े याचिकाओं के समूह पर सुनवाई कर रही थी। ये भूखंड जोधपुर के कबीर मार्ग स्थित हैं।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि नीलामी के माध्यम से उन्हें भूखंड आवंटित किए गए लेकिन नगर निगम ने उन्हें कब्जा नहीं सौंपा। वहीं कुछ अन्य लोगों ने हस्तक्षेप आवेदन दायर कर इन भूखंडों पर अपने अधिकार का दावा किया और लंबे समय से कब्जे में होने की बात कही।

नगर निगम ने संयुक्त जांच आयोग की रिपोर्ट के आधार पर इन लोगों को अतिक्रमी माना था।

हाईकोर्ट ने गौर किया कि जिन लोगों को निगम अतिक्रमी बता रहा था उनके कब्जे के कारण ही नीलामी में भूखंड हासिल करने वाले याचिकाकर्ताओं को कब्जा नहीं दिया जा सका।

कोर्ट ने निगम की इस स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह मामले पर लंबे समय तक बैठा नहीं रह सकता और कब्जा सौंपने से बचने के लिए कोई बहाना नहीं बना सकता। निगम की जिम्मेदारी थी कि वह कानून के अनुसार कार्रवाई करते हुए नीलामी की प्रक्रिया को पूरा करे।

हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य के आचरण और कामकाज से नागरिकों के मन में सुरक्षा की भावना पैदा होनी चाहिए। जब कोई नागरिक सरकार के साथ व्यवहार करता है तो उसे सरकार की ओर से किए गए आश्वासनों और उसके कार्यों पर भरोसा करने की स्थिति में होना चाहिए। सरकारी कार्यों के प्रति एक विशेष विश्वास जुड़ा होता है और नागरिकों को उसके आधार पर अपने मामलों में निर्णय लेने का अधिकार है।

कोर्ट ने इस संदर्भ में कलकत्ता हाईकोर्ट के सुरेंद्र प्रसाद मिश्रा बनाम ओएनजीसी मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। इसमें कहा गया कि यदि सरकार या सरकारी संस्था किसी व्यक्ति से ऐसा वादा करती है जिसे वह जानती है कि संबंधित व्यक्ति उस पर भरोसा करके अपना रुख बदल सकता है तो परिस्थितियों के अनुसार सरकार उस वादे से पीछे नहीं हट सकती।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कब्जा न मिलने के लिए याचिकाकर्ताओं को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने माना कि निगम की लापरवाही, उदासीनता और जरूरी रिकॉर्ड के रखरखाव में कमी के कारण पैदा हुई स्थिति का खामियाजा नीलामी में भूखंड हासिल करने वालों को नहीं भुगतना चाहिए।

हालांकि कोर्ट ने अतिक्रमण हटाने के मामले में कानून की प्रक्रिया का पालन करने पर भी जोर दिया।

जस्टिस अनूप कुमार ढांड ने संविधान के अनुच्छेद 21 और मैग्ना कार्टा के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ कार्रवाई करते समय विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन जरूरी है।

विवादित भूखंडों पर अधिकार और स्वामित्व को लेकर अलग-अलग दावों को देखते हुए हाईकोर्ट ने मामले के निपटारे के लिए स्थानीय स्वशासन विभाग के उच्च अधिकारियों और जोधपुर नगर निगम के आयुक्त की एक समिति गठित करने का निर्देश दिया। समिति याचिकाकर्ताओं और हस्तक्षेप आवेदकों की ओर से पेश किए गए अभ्यावेदनों पर विचार कर आवंटन प्रक्रिया को पूरा करेगी।

कोर्ट ने समिति को यह पूरी प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया। इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने सभी याचिकाओं का निपटारा किया।

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