बकाया भुगतान के नोटिस देना ब्लैकलिस्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं, चेतावनी और सुनवाई जरूरी: राजस्थान हाईकोर्ट ने 3 साल की रोक हटाई
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि ठेकेदार को बकाया राशि जमा करने के लिए बार-बार नोटिस देना उसे भविष्य की निविदाओं से बाहर करने या ब्लैकलिस्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यदि विभाग ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट या भविष्य की निविदाओं से वंचित करने की कार्रवाई करना चाहता है तो उसे पहले स्पष्ट रूप से यह बताना होगा कि भुगतान न करने पर ऐसी कार्रवाई की जा सकती है और संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर भी देना होगा।
जस्टिस अनूप कुमार ढांड ने एक ठेकेदार के खिलाफ पारित वह आदेश रद्द किया, जिसके तहत उसे विभाग की भविष्य की निविदाओं में हिस्सा लेने से तीन साल के लिए रोक दिया गया। कोर्ट ने पाया कि कार्रवाई से पहले ठेकेदार को प्रभावी सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया।
मामला उदयपुर के सज्जनगढ़ जैविक उद्यान में गोल्फ कार्ट चलाने से जुड़ा था। याचिकाकर्ता विभाग की ओर से जारी निविदा में सफल रहा था। उसके ऊपर कुछ राशि बकाया थी, जिसे उसने जमा नहीं किया। विभाग ने बकाया राशि जमा करने के लिए उसे कई नोटिस जारी किए, लेकिन भुगतान नहीं किया गया।
इसके बाद विभाग ने याचिकाकर्ता को भविष्य की निविदा प्रक्रियाओं में हिस्सा लेने से रोकने का आदेश पारित किया। इस कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसे ब्लैकलिस्ट करने से पहले ऐसा कोई उचित कारण बताओ नोटिस नहीं दिया गया, जिसमें यह बताया गया हो कि बकाया राशि जमा नहीं करने की स्थिति में उसे भविष्य की निविदाओं से बाहर किया जा सकता है। साथ ही, आदेश पारित करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का अवसर भी नहीं दिया गया।
विभाग की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि याचिकाकर्ता को बकाया राशि जमा करने के लिए कई नोटिस दिए गए, लेकिन उसने उनका पालन नहीं किया। विभाग ने राजस्थान पारदर्शी सार्वजनिक खरीद अधिनियम, 2012 की धारा 40 के तहत कार्रवाई को उचित बताया।
हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही विभाग ने बकाया राशि के भुगतान के लिए कई नोटिस जारी किए हों, लेकिन किसी भी नोटिस में यह नहीं बताया गया कि पालन नहीं करने पर याचिकाकर्ता को भविष्य की निविदाओं में हिस्सा लेने से रोक दिया जाएगा।
कोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के तहत किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रतिकूल कार्रवाई करने से पहले उसे मामले की जानकारी देना और अपना पक्ष स्पष्ट करने का उचित अवसर देना जरूरी है।
जस्टिस अनूप कुमार ढांड ने कहा,
“प्राकृतिक न्याय का मूल सिद्धांत 'दूसरे पक्ष को भी सुना जाए' है। इसके कई पहलू हैं, जिनमें मामले की सूचना देना और अपना पक्ष समझाने का उचित अवसर देना शामिल है।”
कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में विभाग ने कारण बताओ नोटिस जारी करके पहली आवश्यकता पूरी की, लेकिन याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने और सफाई देने का उचित अवसर नहीं दिया गया। इसलिए आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का गंभीर उल्लंघन है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बकाया राशि की वसूली और ठेकेदार को भविष्य की निविदाओं से बाहर करने की कार्रवाई अलग-अलग पहलू हैं। केवल भुगतान के लिए जारी किए गए नोटिस को ब्लैकलिस्ट करने की प्रस्तावित कार्रवाई की पूर्व सूचना नहीं माना जा सकता।
इन परिस्थितियों में कोर्ट ने विभाग द्वारा पारित आदेश को कानून की नजर में टिकाऊ नहीं माना और उसे रद्द किया।