राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ मजिस्ट्रेट बिना भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223 में निर्धारित सुरक्षा उपायों का पालन किए सीधे FIR दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकता।

जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने कहा कि यदि शिकायत सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े कार्यों को लेकर हो, तो मजिस्ट्रेट को FIR दर्ज कराने या संज्ञान लेने से पहले संबंधित अधिकारियों को सुनवाई का अवसर देना और उनके सीनियर अधिकारी से तथ्यात्मक रिपोर्ट मंगाना अनिवार्य है।

अदालत ने कहा कि BNSS की धारा 223 सरकारी कर्मचारियों को दुर्भावनापूर्ण, प्रतिशोधात्मक और उत्पीड़नकारी मुकदमों से बचाने के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी सुरक्षा प्रदान करती है।

मामले में विशेष अदालत, SC/ST Act ने एक शिकायत के आधार पर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया था। इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

मामले के अनुसार शिकायतकर्ता के खिलाफ पहले से उसी थाने में FIR दर्ज थी, जिसमें पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल किया था। इसके बाद शिकायतकर्ता ने उन्हीं पुलिस अधिकारियों के खिलाफ जांच में अनियमितता, मारपीट, गाली-गलौज और बल प्रयोग के आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई।

इस मामले में जांच अधिकारी ने निगेटिव फाइनल रिपोर्ट दाखिल करते हुए कहा था कि शिकायत प्रतिशोध की भावना से दर्ज कराई गई प्रतीत होती है। इसका उद्देश्य पुलिस अधिकारियों पर दबाव बनाना है।

इसके बावजूद विशेष अदालत ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दे दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में आरोप पहले से चल रहे आपराधिक विवाद और क्रॉस FIR की पृष्ठभूमि में लगाए गए। साथ ही आरोप पुलिस अधिकारियों के आधिकारिक कार्यों के दौरान किए गए कृत्यों से जुड़े थे।

अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में मारपीट और दुर्व्यवहार के आरोप अत्यधिक विवादित तथ्य बन जाते हैं, जिन्हें बिना प्रारंभिक न्यायिक जांच के सीधे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा,

“धारा 223 BNSS पूर्व व्यवस्था से एक महत्वपूर्ण बदलाव है। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि संज्ञान लेने की प्रक्रिया केवल औपचारिक कार्रवाई न होकर एक संतुलित और विचारपूर्ण न्यायिक प्रक्रिया हो।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान केवल औपचारिकता नहीं बल्कि सरकारी कर्मचारियों को उनके आधिकारिक कार्यों के कारण होने वाले झूठे और प्रतिशोधात्मक मुकदमों से बचाने के लिए बनाया गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को शिकायत को ध्यानपूर्वक पढ़ना, उसका विश्लेषण करना और यह तय करना जरूरी है कि मामला धारा 175(3) के तहत एफआईआर दर्ज करने योग्य है या धारा 223 के तहत प्रक्रिया अपनाने की आवश्यकता है।

अदालत ने विशेष जज के आदेश को यांत्रिक और बिना पर्याप्त कारण वाला बताते हुए कहा कि आदेश में यह नहीं दिखता कि मजिस्ट्रेट ने कानून के अनुसार आवश्यक संतुष्टि हासिल की थी।

हाईकोर्ट ने कहा,

“कानून शिकायतों को आंख बंद करके FIR दर्ज करने के लिए फारवर्ड करने की अनुमति नहीं देता। मजिस्ट्रेट पर यह जिम्मेदारी है कि वह शिकायत की सावधानीपूर्वक जांच करे और विचारपूर्ण राय बनाए।”

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 175(3) के तहत FIR दर्ज करने का आदेश देना तकनीकी रूप से संज्ञान लेना नहीं माना जाएगा लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि यह शक्ति लापरवाही या औपचारिक तरीके से इस्तेमाल की जाए।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने विशेष अदालत का आदेश रद्द किया और मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि BNSS की धारा 223 का अनिवार्य रूप से पालन किया जाए।

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