लंबित आपराधिक मामले के आरोपों के आधार पर मुआवजा नहीं दिया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

Update: 2026-05-21 06:11 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि जब क्रूरता और उत्पीड़न के आरोप किसी अलग आपराधिक मामले में विचाराधीन हों तब घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act) के तहत सुनवाई कर रही अदालत उन विवादित आरोपों के आधार पर मुआवजा नहीं दे सकती।

जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए निचली अदालतों द्वारा पत्नी को मानसिक प्रताड़ना के आरोपों पर दिए गए 2 लाख रुपये के मुआवजे के आदेश को रद्द कर दिया।

अदालत ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत अदालत का अधिकार क्षेत्र राहत और संरक्षण देने तक सीमित है। इसे आपराधिक मुकदमे का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा,

“विवादित आरोपों के आधार पर मुआवजा देना जिन पर अभी आपराधिक अदालत में सुनवाई चल रही है विवाद का पूर्व निर्णय करने जैसा होगा और इससे दोनों पक्षों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।”

मामला उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें पति ने घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत पारित आदेश को चुनौती दी थी। पत्नी ने वर्ष 2014 में संरक्षण, भरण-पोषण और मुआवजे की मांग करते हुए आवेदन दायर किया था। निचली अदालत ने वर्ष 2025 में पति को भरण-पोषण देने के साथ-साथ 2 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था।

इसके खिलाफ पति ने अपील दायर की। अपीलीय अदालत ने मासिक भरण-पोषण राशि कम कर दी, लेकिन मुआवजे का आदेश बरकरार रखा। इसके बाद पति ने राजस्थान हाईकोर्ट का रुख किया।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि क्रूरता और उत्पीड़न के आरोप पहले से ही सक्षम आपराधिक अदालत में लंबित हैं और अभी उन पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं निकला है। ऐसे में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत सुनवाई कर रही अदालतों को संयम बरतना चाहिए था।

अदालत ने कहा,

“जब आपराधिक कानून पहले ही लागू हो चुका है और आरोपों पर साक्ष्यों के आधार पर फैसला आना बाकी है, तब घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत अदालतों को आरोपी की कथित दोषसिद्धि से जुड़ी टिप्पणियां करने से बचना चाहिए।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा अधिनियम का उद्देश्य पीड़ित महिला को तत्काल नागरिक राहत देना है, जैसे आवास, भरण-पोषण, सुरक्षा या आर्थिक सहायता ताकि वह सम्मानपूर्वक जीवन जी सके।

अदालत ने माना कि निचली अदालतें यह स्वीकार कर सकती थीं कि पत्नी कानूनी रूप से पति की विवाहित पत्नी है, वह उचित कारणों से अलग रह रही है और उसके पास खुद के भरण-पोषण के पर्याप्त साधन नहीं हैं। लेकिन लंबित आपराधिक आरोपों पर निष्कर्ष देना उचित नहीं था।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ राजस्थान हाईकोर्ट ने पत्नी को मानसिक प्रताड़ना के आरोपों पर दिए गए 2 लाख रुपये के मुआवजे का आदेश रद्द कर दिया।

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