भरण-पोषण का उद्देश्य भूख और बेघर होने से बचाना, पति पर असहनीय आर्थिक बोझ डालना नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट

Update: 2026-05-21 06:05 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य जरूरतमंद जीवनसाथी को तत्काल सहारा देना और उसे भुखमरी या दर-दर भटकने से बचाना है, न कि पति पर ऐसा भारी आर्थिक बोझ डालना जिसे वह वहन ही न कर सके।

जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने कहा कि यदि भरण-पोषण के मामलों के निपटारे में वर्षों की देरी हो जाए और फिर आवेदन की तारीख से ही बड़ी रकम देने का आदेश पारित किया जाए, तो यह वेतनभोगी या सीमित आय वाले व्यक्ति पर अत्यधिक और असहनीय आर्थिक दबाव डाल सकता है।

अदालत ने कहा,

“न्यायिक व्यवस्था में हुई देरी को किसी एक पक्ष पर नहीं थोपा जा सकता। ऐसी देरी को आधार बनाकर किसी पक्ष पर भारी पिछला आर्थिक दायित्व डालना न्यायसंगत नहीं होगा।”

मामला घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत दायर एक याचिका से जुड़ा था। पत्नी ने वर्ष 2014 में संरक्षण, भरण-पोषण और मुआवजे की मांग करते हुए आवेदन दाखिल किया था।

बता दें, निचली अदालत ने वर्ष 2025 में फैसला सुनाते हुए पति को 2014 से प्रभावी 20 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने और 2 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।

इसके खिलाफ पति ने अपील दायर की। अपीलीय अदालत ने मासिक भरण-पोषण राशि घटाकर 10 हजार रुपये कर दी लेकिन बाकी आदेश बरकरार रखा। इसके बाद पति ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालतें भरण-पोषण कानून के मूल उद्देश्य को समझने में चूक गईं। अदालत ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण कोई दंडात्मक व्यवस्था नहीं है और न ही वैवाहिक विवाद के कारण पति को सजा देने का माध्यम है।

अदालत ने कहा,

“कानून ने कभी यह कल्पना नहीं की थी कि भरण-पोषण की कार्यवाही धन वसूली के मुकदमे का रूप ले लेगी या फिर इतनी बड़ी पिछली देनदारी पैदा कर देगी, जिसे कोई वेतनभोगी व्यक्ति चुका ही न सके।”

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि 10 से 12 वर्षों की देरी के बाद लाखों रुपये की बकाया राशि एक साथ चुकाने का आदेश देना व्यावहारिक जीवन की वास्तविकताओं की अनदेखी करना है।

अदालत के अनुसार मासिक भरण-पोषण देना एक अलग बात है लेकिन एक दशक बाद भारी बकाया राशि थोपना असहनीय स्थिति पैदा कर सकता है।

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि कोई महिला इतने वर्षों तक स्वयं अपना जीवन चला रही है और मुकदमा लड़ रही है तो एक दशक बाद भारी पिछली रकम देना तत्काल सहायता के उद्देश्य को पूरा नहीं करता। इससे मामला भरण-पोषण से अधिक आर्थिक मुआवजे जैसा बन जाता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण मामलों को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जाना चाहिए और यदि देरी होती है तो उसका पूरा दोष किसी एक पक्ष पर नहीं डाला जा सकता।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने निचली अदालतों के आदेश में संशोधन करते हुए निर्देश दिया कि पति को भरण-पोषण की राशि केवल वर्ष 2025 में आदेश पारित होने की तारीख से देनी होगी, न कि वर्ष 2014 से।

Tags:    

Similar News