इलेक्ट्रॉनिक सबूत की प्रमाणित कॉपी न देना निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन: राजस्थान हाइकोर्ट
राजस्थान हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि आरोपी को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की प्रमाणित क्लोन कॉपी न देना उसके निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है, जो अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है।
जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की पीठ ने भ्रष्टाचार के एक मामले में आरोपी की याचिका स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि अप्रमाणित कॉपी देना या प्रमाणित क्लोन कॉपी देने से इनकार करना न केवल निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का हनन है, बल्कि आरोपी के लिए डिस्चार्ज (मुक्ति) का अधिकार प्रभावी ढंग से उपयोग करने में भी बाधा डालता है।
मामले में आरोपी ने दलील दी थी कि उसे जो सीडी उपलब्ध कराई गई, वह अधूरी थी और उसमें हैश वैल्यू के साथ प्रमाणित क्लोन कॉपी नहीं दी गई। साथ ही मूल रिकॉर्डिंग डिवाइस भी पेश नहीं किया गया।
अदालत ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की अपनी वैज्ञानिक विशेषताएं होती हैं, जिनके आधार पर उसकी सत्यता और अखंडता की जांच की जाती है। इसलिए हैश वैल्यू के साथ क्लोन कॉपी देना आवश्यक है ताकि साक्ष्य की पूरी श्रृंखला (चेन) प्रमाणित की जा सके।
हाइकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पी. गोपालकृष्णन बनाम केरल राज्य का हवाला देते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष को उन सभी दस्तावेजों और साक्ष्यों की प्रतियां देना अनिवार्य है, जिन पर वह निर्भर करता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी कोई नया दस्तावेज नहीं मांग रहा बल्कि केवल वही सामग्री मांग रहा है जिसकी सत्यता जांचना जरूरी है। यदि साक्ष्य प्रमाणित नहीं होगा तो बचाव पक्ष उसका सही तरीके से उपयोग नहीं कर पाएगा।
हालांकि, मूल रिकॉर्डिंग डिवाइस पेश करने के सवाल पर अदालत ने कहा कि इस पर फैसला ट्रायल के दौरान किया जा सकता है।
इसी के साथ हाइकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश आंशिक रूप से रद्द किया, जिसमें क्लोन कॉपी देने से इनकार किया गया और आरोपी को प्रमाणित क्लोन कॉपी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।