न्याय में देरी स्वीकार नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट ने अपीलों को रिट याचिका में बदला
राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत पारित आदेशों के खिलाफ लंबित अपीलों को रिट याचिकाओं में परिवर्तित कर दिया। अदालत ने कहा कि न्याय में देरी नहीं होनी चाहिए और तकनीकी बाधाओं के कारण मामलों को लंबित नहीं रखा जा सकता।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने यह निर्णय उस समय लिया, जब इन अपीलों की ग्राह्यता को लेकर कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं थी।
मामले में फैमिली कोर्ट द्वारा धारा 24 के तहत दिए गए आदेशों के खिलाफ कई अपीलें दायर की गईं। प्रतिवादियों की ओर से यह आपत्ति उठाई गई कि इस तरह के आदेश अंतरिम प्रकृति के होते हैं, इसलिए इनके खिलाफ अपील सुनवाई योग्य नहीं है।
अदालत ने पूर्व के निर्णयों का अवलोकन किया। एक मामले में पूर्ण पीठ ने ऐसे आदेशों के खिलाफ अपील को मान्य माना था, जबकि दूसरे मामले में इस निर्णय पर संदेह जताते हुए इसे बड़ी पीठ को भेज दिया गया। अभी तक इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय नहीं आया है, जिससे स्थिति अनिश्चित बनी हुई है।
अदालत ने कहा कि जब यह प्रश्न बड़ी पीठ के समक्ष लंबित है, तब इस पर निर्णय देना न्यायिक अनुशासन के खिलाफ होगा।
साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि मामलों का शीघ्र निपटारा सार्वजनिक हित में है और “न्याय में देरी, न्याय से वंचित करना” के सिद्धांत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसी को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने सभी अपीलों को रिट याचिकाओं में बदलने का निर्देश दिया, ताकि मामलों की सुनवाई बिना देरी के हो सके।
अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इन मामलों को सिंगल बेंच के समक्ष रिट याचिका के रूप में पुनः पंजीकृत कर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।