शून्य अंक वालों की नौकरी रद्द: राजस्थान हाईकोर्ट ने 1200 से अधिक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का चयन किया निरस्त
राजस्थान हाईकोर्ट ने चतुर्थ श्रेणी सरकारी कर्मचारियों की भर्ती में बड़ा फैसला सुनाते हुए करीब 1200 से अधिक अभ्यर्थियों का चयन रद्द किया। इनमें अधिकांश उम्मीदवार आरक्षित वर्ग से थे जिन्हें लिखित परीक्षा में शून्य या लगभग शून्य अंक मिलने के बावजूद चयनित कर लिया गया।
जस्टिस आनंद शर्मा की सिंगल बेंच ने कहा कि सरकारी नौकरी कोई दान या कृपा नहीं है। हर सरकारी पद, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो सार्वजनिक जिम्मेदारी से जुड़ा होता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि चतुर्थ श्रेणी पदों के लिए भी न्यूनतम योग्यता और क्षमता जरूरी है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा,
“सामाजिक न्याय और आरक्षण का उद्देश्य महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके नाम पर योग्यता और प्रशासनिक दक्षता को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।”
अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि जिन श्रेणियों में ऐसे अभ्यर्थियों का चयन हुआ है वहां नई मेरिट सूची तैयार की जाए।
मामला उन दो अभ्यर्थियों की याचिकाओं से जुड़ा था, जिन्होंने आरक्षित वर्ग के तहत आवेदन किया था लेकिन परीक्षा में नकारात्मक अंक आने के कारण उनका चयन नहीं हुआ। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि भर्ती नियमों में न्यूनतम अंक तय नहीं थे जबकि कई अन्य अभ्यर्थियों को सामान्यीकरण प्रक्रिया के बाद 0.0035 जैसे बेहद कम अंकों पर भी नियुक्ति दी गई।
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि 1200 से अधिक चयनित अभ्यर्थियों के मूल अंक नकारात्मक थे और सामान्यीकरण के बाद भी उनके अंक लगभग शून्य ही रहे।
हाईकोर्ट ने कहा कि आरक्षण का उद्देश्य वंचित वर्गों को अवसर देना है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पूरी तरह अयोग्य अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी जाए। अदालत ने कहा कि ऐसा करना भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता और संस्थागत व्यवस्था पर चोट पहुंचाता है।
फैसले में संविधान के अनुच्छेद 335 का भी उल्लेख किया गया जिसमें आरक्षित वर्गों के दावों के साथ प्रशासनिक दक्षता बनाए रखने की बात कही गई है।
अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी कि न्यूनतम अंक तय नहीं थे इसलिए ऐसे चयन वैध हैं।
हाईकोर्ट ने कहा,
“केवल इस वजह से कि नियमों में न्यूनतम अंक निर्धारित नहीं थे, राज्य अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाता।”
अदालत ने सामान्यीकरण प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इसका उपयोग ऐसे अभ्यर्थियों को कृत्रिम रूप से आगे बढ़ाने के लिए नहीं किया जा सकता, जिन्होंने न्यूनतम योग्यता भी प्रदर्शित नहीं की हो।
अंत में हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे चयन को स्वीकार करना सार्वजनिक रोजगार में मानकों के पूर्ण पतन को न्यायिक स्वीकृति देने जैसा होगा।