आंशिक समझौते पर पूरी FIR रद्द करना गलत: राजस्थान हाईकोर्ट ने आदेश वापस लेकर जारी किए नए दिशा-निर्देश

Update: 2026-04-03 08:55 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि आंशिक समझौते के आधार पर पूरी FIR रद्द करना न्यायिक त्रुटि थी। अदालत ने अपने पहले के आदेश को आंशिक रूप से वापस लेते हुए स्पष्ट किया कि जांच बाकी आरोपियों के खिलाफ जारी रहेगी।

जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने यह भी कहा कि इस प्रकार की गलती को सुधारना रिव्यू (पुनर्विचार) नहीं बल्कि रिकॉल (आदेश वापस लेना) की श्रेणी में आता है।

मामले में कुल 15 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज थी, लेकिन शिकायतकर्ता ने केवल दो आरोपियों के साथ समझौता किया। उन दो आरोपियों में से एक ने समझौते के आधार पर FIR रद्द करने की याचिका दायर की।

सुनवाई के दौरान अदालत से चूक हो गई और पूरे मामले की FIR ही रद्द कर दी गई जबकि बाकी आरोपी इस याचिका का हिस्सा भी नहीं थे।

बाद में शिकायतकर्ता ने इस त्रुटि को सुधारने के लिए आवेदन दाखिल किया।

हाईकोर्ट ने माना कि यह कलम या मन की भूल थी और अदालत का मूल उद्देश्य केवल याचिकाकर्ता आरोपी तक ही राहत सीमित रखना था, न कि सभी आरोपियों को।

अदालत ने स्पष्ट किया कि 'रिव्यू' और 'रिकॉल' में अंतर है। रिव्यू में मामले का पुनर्मूल्यांकन किया जाता है, जबकि रिकॉल का उपयोग तब किया जाता है जब आदेश में कोई तकनीकी या अनजाने में हुई गलती हो, जिसे ठीक करना आवश्यक हो।

अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में आदेश को सही रूप में बहाल करना न्याय के हित में जरूरी है।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अपने पुराने आदेश के उस हिस्से को निरस्त कर दिया, जिसमें सभी आरोपियों के खिलाफ FIR रद्द कर दी गई, और जांच एजेंसी को बाकी आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखने की अनुमति दी।

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