केवल रोजगार के स्वरूप के आधार पर महिला संविदा कर्मचारियों को मैटर्निटी लीव देने से इनकार नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि रोजगार का स्वरूप—चाहे वह नियमित हो, अस्थायी (कैजुअल) हो या संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) आधारित—केवल इसी आधार पर किसी महिला कर्मचारी को मातृत्व लाभ (मैटर्निटी बेनिफिट) देने से इनकार करने का ठोस कारण नहीं हो सकता, बशर्ते अन्य सभी कानूनी शर्तें पूरी होती हों।
इस संबंध में यदि संविदा की कोई शर्त 'मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961' (Maternity Benefits Act, 1961) के प्रावधानों के विपरीत है, तो उस पर इस अधिनियम के नियम ही लागू होंगे।
जस्टिस बिपिन गुप्ता की पीठ ने स्पष्ट किया कि मातृत्व लाभ केवल सेवा से जुड़ी कोई रियायत या सामान्य छुट्टी की सुविधा नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के स्वास्थ्य, गरिमा और कल्याण की रक्षा के लिए एक कानूनी सुरक्षा है। यह सुरक्षा संविधान द्वारा दी गई समानता और गरिमा की गारंटी पर आधारित है, और संविधान के अनुच्छेद 42 के तहत भी अनिवार्य है।
मामले के संदर्भ में याचिकाकर्ता को राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा संविदा आधार पर सलाहकार (कंसल्टेंट) के रूप में नियुक्त किया गया था। इस दौरान उन्होंने 6 महीने के मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया।
राज्य सरकार ने उनके आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उनकी नियुक्ति के आदेश में एक शर्त थी, जिसके अनुसार राज्य सरकार द्वारा घोषित छुट्टियों के अलावा कोई अन्य छुट्टी नहीं दी जा सकती। इसी वजह से यह याचिका दायर की गई।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा जारी एक पत्र के अनुसार, महिलाएं मातृत्व लाभ पाने की हकदार हैं। इसमें उनके रोजगार के स्वरूप (चाहे वे सीधे तौर पर काम कर रही हों या किसी एजेंसी के माध्यम से संविदा आधार पर हों या सलाहकार के रूप में) का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने राय दी,
“मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) केवल कर्मचारियों को मिलने वाली सामान्य छुट्टी नहीं है; बल्कि, यह कानूनी अधिकार है। इसका उद्देश्य यह है कि बच्चे के जन्म के बाद महिला अपनी शारीरिक ताकत और स्वास्थ्य को फिर से हासिल कर सके। साथ ही यह सुनिश्चित हो सके कि बच्चे को उसके जीवन के शुरुआती महत्वपूर्ण चरणों में जरूरी प्यार, देखभाल और स्नेह मिल सके। मातृत्व अवकाश देने को केवल इस आधार पर नहीं रोका जा सकता कि नौकरी किस तरह की है या कितने समय की है। चाहे कोई महिला नियमित, अस्थायी, तदर्थ (ad hoc), तत्काल अस्थायी, या अनुबंध (Contractual) आधार पर काम कर रही हो, उसे केवल उसकी नौकरी के प्रकार के आधार पर मातृत्व अवकाश देने से मना नहीं किया जा सकता। बशर्ते कि सभी जरूरी कानूनी शर्तें पूरी हों और मातृत्व अवकाश की अवधि उसकी नौकरी की अवधि के भीतर आती हो।”
इसमें सुप्रीम कोर्ट के 'म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ दिल्ली बनाम फीमेल वर्कर्स (मस्टर रोल्स)' मामले का हवाला दिया गया। इस मामले में उन महिलाओं को भी मातृत्व लाभ (Maternity Benefits) देने की बात कही गई, जो कैज़ुअल (Casual) या मस्टर रोल (Muster Roll) आधार पर काम कर रही थीं।
इसलिए कोर्ट ने माना कि अगर सभी कानूनी शर्तें पूरी होती हैं, तो नौकरी के प्रकार को मातृत्व लाभ देने से मना करने का ठोस आधार नहीं माना जा सकता। ऐसा करना इस कानून के 'सुरक्षात्मक उद्देश्य' के खिलाफ होगा।
कोर्ट ने आगे कहा कि इस कानून की धारा 27 के तहत अगर किसी अन्य कानून, फैसले, समझौते या सेवा अनुबंध में कोई ऐसी बात है जो इस कानून से मेल नहीं खाती तो इस कानून को ही प्राथमिकता दी जाएगी। इसलिए अनुबंध की कोई ऐसी शर्त जो इस कानून का उल्लंघन करती हो, उसे कानूनी नियमों से ऊपर नहीं माना जा सकता।
इस संदर्भ में, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई मातृत्व अवकाश की अवधि उसके शुरुआती अनुबंध की अवधि के भीतर ही आती है, इसलिए उसे इन लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।
इसके अनुसार, याचिका स्वीकार की गई और राज्य को निर्देश दिया गया कि वह याचिकाकर्ता को मातृत्व अवकाश प्रदान करे।
Case Title : Smt. Shivangi Khandelwal v State of Rajasthan & Anr