सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट की ट्रस्टीशिप को पहली नज़र में वसीयत के ज़रिए किसी और को नहीं सौंपा जा सकता: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि किसी पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट का कोई ट्रस्टी, पहली नज़र में, अपनी वसीयत के ज़रिए अपने पद के लिए किसी उत्तराधिकारी को नियुक्त नहीं कर सकता।
कोर्ट ने कहा कि ट्रस्टीशिप विश्वास का एक व्यक्तिगत पद है, जो विरासत में नहीं मिलता। साथ ही किसी पब्लिक ट्रस्ट का प्रबंधन "पारिवारिक या वंशानुगत अधिकार" नहीं बन सकता।
जस्टिस दीपक गुप्ता ने फरीदाबाद के 'जनहित सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट' द्वारा दायर एक रिवीजन याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।
जब तक कि इस मामले का फैसला नहीं हो जाता, कोर्ट ने एक दिवंगत 'लाइफ ट्रस्टी' (आजीवन ट्रस्टी) की बहू को अपनी सास की वसीयत के आधार पर ट्रस्टी के रूप में काम करने से रोक दिया।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"भले ही वसीयत असली हो और सही तरीके से बनाई गई हो, फिर भी यह ऐसा कोई अधिकार नहीं दे सकती, जिसे वसीयत करने वाली महिला खुद किसी और को देने के लिए अधिकृत नहीं थी। किसी पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट की ट्रस्टीशिप कोई ऐसी निजी संपत्ति नहीं है जिसे किसी आम संपत्ति की तरह वसीयत के ज़रिए आगे सौंपा जा सके।"
यह ट्रस्ट 2 जून 1989 के एक विलेख (डीड) के ज़रिए बनाया गया, जिसमें शंभू दयाल शास्त्री को "ट्रस्टी" बनाया गया। इसके उद्देश्यों में गरीबों की मदद करना, शिक्षा और चिकित्सा सुविधाएं देना शामिल है, और यह निर्विवाद रूप से एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट है।
साल 2004 में शास्त्री ने अपनी पत्नी अशर्फी देवी और अपने दो बेटों, प्रहलाद शर्मा और महेंद्र शर्मा को 'आजीवन ट्रस्टी' (होल-लाइफ ट्रस्टी) नियुक्त किया। 2007 में उनके निधन के बाद अन्य ट्रस्टियों ने प्रहलाद शर्मा को मुख्य ट्रस्टी और चेयरमैन चुना। अगस्त 2015 में एक प्रस्ताव के ज़रिए महेंद्र शर्मा (प्रतिवादी संख्या 2) को ट्रस्टी के पद से हटा दिया गया। यह कदम ट्रस्ट के सेवदारों के साथ कथित मारपीट के मामले में FIR दर्ज होने के बाद उठाया गया।
2017 में हाईकोर्ट ने उन्हें हटाए जाने के फैसले पर रोक लगाने से इनकार किया था। इस फैसले को चुनौती देने वाली उनकी याचिका एक अलग मुकदमे में अभी भी लंबित है। अशरफी देवी का 2019 में निधन हो गया। उन्होंने 6 अक्टूबर 2015 की एक रजिस्टर्ड वसीयत छोड़ी थी।
इस वसीयत के ज़रिए उन्होंने अपनी संपत्तियां महेंद्र शर्मा को सौंप दीं और कहा कि वे ट्रस्ट के "प्रमुख" होंगे। साथ ही उन्होंने महेंद्र शर्मा की पत्नी अशुलिका शर्मा (प्रतिवादी संख्या 1) को उन ट्रस्टों के लिए "नॉमिनी" (नामित व्यक्ति) बना दिया, जिनमें अशरफी देवी जीवन भर ट्रस्टी रही थीं।
ट्रस्ट ने एक मुकदमा दायर किया और मांग की कि वसीयत को - जहां तक यह किसी प्रतिवादी को ट्रस्टी नियुक्त करती है - अमान्य घोषित किया जाए और इसे ट्रस्ट पर बाध्यकारी न माना जाए। इसके अलावा, उन्होंने एक निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) की भी मांग की, ताकि प्रतिवादियों को ट्रस्ट के कामकाज में बाधा डालने से रोका जा सके।
2019 में ट्रायल कोर्ट ने अंतरिम राहत देते हुए कहा कि न तो ट्रस्ट डीड और न ही सप्लीमेंट्री डीड में यह प्रावधान है कि कोई ट्रस्टी वसीयत के ज़रिए अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर सके। हालाँकि, मार्च 2026 में ट्रायल कोर्ट ने निषेधाज्ञा की अर्ज़ी खारिज की, और फरीदाबाद के एडिशनल ज़िला जज ने इस आदेश को बरकरार रखा।
अदालतों ने माना कि रजिस्टर्ड वसीयत को सही (असली) माना जाता है; ट्रस्ट डीड की धारा 6(b) के तहत अशरफी देवी को एक ट्रस्टी नामित करने का अधिकार था; निषेधाज्ञा देना एक तरह से अंतिम राहत देने जैसा होगा; और इससे जुड़े सवाल अन्य मुकदमों में भी लंबित हैं।
Case Title : Janhit Sewa Charitable Trust (Regd.), through its authorised trustee Shri Jagdish Somani v. Smt. Ashulika Sharma and another