वैवाहिक घर में दूसरे पुरुष की मौजूदगी मात्र से व्यभिचार साबित नहीं होता: मद्रास हाईकोर्ट ने पति की तलाक की अपील खारिज की
मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने कहा है कि वैवाहिक घर में किसी दूसरे व्यक्ति की मौजूदगी मात्र से व्यभिचार (Adultery) साबित नहीं होता। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(i) के तहत तलाक की डिक्री देने के लिए अवैध संबंधों के विश्वसनीय और ठोस सबूत होना जरूरी है।
जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस एम.डी. सुमति की डिवीजन बेंच ने यह टिप्पणी पति की अपील खारिज करते हुए की। पति ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी तलाक याचिका खारिज करते हुए पत्नी की वैवाहिक अधिकारों की बहाली (Restitution of Conjugal Rights) की याचिका स्वीकार की गई थी।
कोर्ट ने कहा, "व्यभिचार एक गंभीर वैवाहिक आरोप है, जिसे ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित किया जाना चाहिए। हालांकि, ऐसे मामलों में प्रत्यक्ष साक्ष्य हमेशा उपलब्ध नहीं हो सकते, लेकिन जिन परिस्थितियों पर भरोसा किया जा रहा है, वे इतनी मजबूत होनी चाहिए कि उनसे व्यभिचार का उचित निष्कर्ष निकाला जा सके। केवल वैवाहिक घर में किसी दूसरे व्यक्ति की मौजूदगी के आधार पर तलाक की डिक्री नहीं दी जा सकती।"
क्या था मामला?
पति और पत्नी का विवाह 23 अगस्त 2018 को हुआ था। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i) और 13(1)(ia) के तहत फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दाखिल की थी।
पति का आरोप था कि पत्नी उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं करती थी, घर के कामकाज से इनकार करती थी, वैवाहिक संबंध बनाने के लिए तैयार नहीं थी और उसने अपनी उम्र तथा पारिवारिक पृष्ठभूमि से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाई थीं।
इसके अलावा, पति ने आरोप लगाया कि पत्नी के विजी नाम के व्यक्ति के साथ अवैध संबंध थे। उसका दावा था कि जुलाई 2019 में उसने दोनों को घर के अंदर एक साथ पाया था।
दूसरी ओर, पत्नी ने सभी आरोपों से इनकार किया। उसने आरोप लगाया कि पति स्वयं अवैध संबंध में शामिल था और उससे अधिक सोना तथा पैसे की मांग करते हुए उसे प्रताड़ित करता था। पत्नी ने वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करने की इच्छा जताते हुए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका दाखिल की थी।
फैमिली कोर्ट ने 6 दिसंबर 2021 को दोनों याचिकाओं पर संयुक्त सुनवाई के बाद पति की तलाक याचिका खारिज कर दी और पत्नी की वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका स्वीकार कर ली। इसके बाद पति ने मद्रास हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।
व्यभिचार साबित करने के लिए केवल संदेह पर्याप्त नहीं
हाईकोर्ट ने पाया कि पति के साक्ष्य से यह साबित नहीं हुआ कि उसने पत्नी को किसी व्यभिचारपूर्ण कृत्य में व्यक्तिगत रूप से शामिल होते देखा था। उसका मामला मुख्य रूप से विजी की घर में मौजूदगी और उससे जुड़ी परिस्थितियों पर आधारित था।
कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने घर की प्रकृति, वहां परिवार के अन्य सदस्यों की मौजूदगी और पति के माता-पिता तथा भाइयों की गवाही उपलब्ध नहीं होने जैसे पहलुओं पर विचार किया था। ऐसे में फैमिली कोर्ट का यह निष्कर्ष उचित था कि पति व्यभिचार का आरोप साबित करने में विफल रहा।
इस संबंध में बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले Dr. N.G. Dastane v. Mrs. S. Dastane (1975) का उल्लेख करते हुए कहा कि वैवाहिक मामलों में सबूत का मानक 'संभावनाओं की प्रबलता' (Preponderance of Probabilities) है, न कि संदेह से परे सबूत।
कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले A. Hemamalini v. A. Pankajanabham (1994) का भी हवाला दिया और कहा कि व्यभिचार के मामलों में कितना भी मजबूत संदेह हो, वह सबूत का स्थान नहीं ले सकता।
घर के कामकाज को लेकर सामान्य मतभेद मानसिक क्रूरता नहीं
मानसिक क्रूरता के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि क्रूरता केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है। परिस्थितियों के आधार पर लगातार मानसिक प्रताड़ना, गंभीर निराधार आरोप और अपमानजनक व्यवहार मानसिक क्रूरता के दायरे में आ सकते हैं।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सामान्य मतभेद, कभी-कभार होने वाली असहमति और घर की जिम्मेदारियों को लेकर सामान्य शिकायतें अपने आप में वैवाहिक क्रूरता नहीं मानी जा सकतीं। इसके लिए संबंधित व्यवहार की प्रकृति, गंभीरता, बारंबारता और उसके समग्र प्रभाव का मूल्यांकन करना जरूरी है।
मौजूदा मामले में पति ने आरोप लगाया था कि पत्नी खाना बनाने, उसे खाना परोसने से इनकार करती थी और अक्सर फोन पर बात करती थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के निष्कर्ष को बरकरार रखा कि पति ऐसे लगातार व्यवहार को साबित नहीं कर पाया, जिसकी गंभीरता मानसिक क्रूरता मानी जा सके।
कोर्ट ने यह भी पाया कि पत्नी द्वारा वैवाहिक संबंध बनाने से इनकार करने और अपनी उम्र तथा पारिवारिक पृष्ठभूमि छिपाने के आरोप भी साक्ष्यों से साबित नहीं हुए।
पत्नी की वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका बरकरार
वैवाहिक अधिकारों की बहाली के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले Saroj Rani v. Sudarshan Kumar Chadha (1984) पर भरोसा किया।
बेंच ने कहा कि ऐसी याचिका पर विचार करते समय यह देखना जरूरी है कि याचिका दाखिल करने वाला पक्ष वास्तव में वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करना चाहता है या नहीं और क्या दूसरे पक्ष के पास ऐसा करने से इनकार करने का कोई कानूनी आधार है।
कोर्ट ने पाया कि पत्नी वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करने की इच्छुक थी, जबकि पति ऐसा करने से इनकार करने का पर्याप्त कानूनी आधार साबित नहीं कर पाया।
इस प्रकार, मद्रास हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज कर फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।