ECIR में बाद में FIR जोड़ने से ED की गिरफ्तारी अवैध नहीं होती: पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने रामप्रस्था प्रमोटर्स एंड डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रमोटर-डायरेक्टर्स द्वारा प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यदि किसी FIR को बाद में ECIR में जोड़ा जाता है तो उससे पहले की गई गिरफ्तारी अवैध नहीं हो जाती।
जस्टिस त्रिभुवन दहिया ने कहा कि केवल इस आधार पर कि दो FIR बाद में एडेंडम के माध्यम से ECIR का हिस्सा बनाई गईं, याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी को दोषपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत ने कहा कि ED पर ऐसा कोई वैधानिक प्रतिबंध नहीं है कि वह ECIR दर्ज करने के बाद सामने आई अन्य FIRs की जांच न कर सके भले ही उन्हें तत्काल ECIR में शामिल न किया गया हो।
हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) में ऐसी कोई प्रक्रिया निर्धारित नहीं है, जिसके तहत बाद में सामने आने वाली अनुसूचित अपराधों से संबंधित FIRs को ECIR में औपचारिक रूप से जोड़ना अनिवार्य हो।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विजय मदनलाल चौधरी फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि ECIR आंतरिक गैर-वैधानिक दस्तावेज है, जिसे ED दंडात्मक कार्रवाई शुरू करने से पहले अपने प्रशासनिक उद्देश्य के लिए तैयार करता है।
मामले में अदालत ने यह भी माना कि 21 जुलाई, 2025 को की गई गिरफ्तारियां PMLA की धारा 19 के अनुरूप थीं। इसमें किसी प्रकार की प्रक्रिया संबंधी या कानूनी त्रुटि नहीं पाई गई, जिससे संविधान के अनुच्छेद 226 या 227 के तहत हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।
याचिकाएं रामप्रस्था समूह के प्रमोटर-डायरेक्टर्स द्वारा दायर की गई थीं, जिनमें उन्होंने अपनी गिरफ्तारी रिमांड आदेशों और PMLA विशेष अदालत द्वारा रिहाई से इनकार करने के आदेश को चुनौती दी थी।
ED का आरोप था कि कंपनी ने गुरुग्राम की विभिन्न रियल एस्टेट परियोजनाओं में पिछले 15–17 वर्षों में करीब 1,100 करोड़ रुपये से अधिक की राशि होमबायर्स से एकत्र की, लेकिन लगभग 2,600 फ्लैटों और प्लॉट्स का कब्जा नहीं दिया।
इसके साथ ही धन को समूह और गैर-समूह कंपनियों में स्थानांतरित कर अपराध की आय उत्पन्न की गई।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि गिरफ्तारी के समय ED के पास ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं था, जिससे दोष सिद्ध होता हो और बाद में FIR जोड़कर गिरफ्तारी को वैध नहीं ठहराया जा सकता।
वहीं ED ने तर्क दिया कि FIRs जांच के दौरान पहले से उसके संज्ञान में थीं। ECIR केवल एक आंतरिक दस्तावेज है जिसकी सामग्री में बदलाव से गिरफ्तारी की वैधता प्रभावित नहीं होती।
हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि FIRs पर बाद में लगी रोक या आपसी समझौते के आधार पर उनका निरस्तीकरण, उस समय दर्ज अनुसूचित अपराधों के अस्तित्व को समाप्त नहीं करता।
अदालत ने 'ग्राउंड्स ऑफ अरेस्ट' और 'रीज़न्स टू बिलीव' में समानता के आधार पर उठाई गई आपत्ति को भी खारिज करते हुए कहा कि PMLA की धारा 19 के तहत गिरफ्तारी की न्यायिक समीक्षा में साक्ष्यों के गुण-दोष की जांच नहीं की जा सकती।
अंततः किसी भी वैधानिक या संवैधानिक उल्लंघन के अभाव में हाइकोर्ट ने दोनों याचिकाएं खारिज करते हुए ED द्वारा की गई गिरफ्तारी और रिमांड को बरकरार रखा।