Article 21 | आपात स्थिति में गैर-सूचीबद्ध अस्पताल में इलाज पर मेडिकल रिइम्बर्समेंट से इनकार नहीं किया जा सकता: पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने हरियाणा सरकार को निर्देश दिया कि वह एक सरकारी कर्मचारी की पत्नी के आपातकालीन इलाज पर गैर-सूचीबद्ध निजी अस्पताल में हुए शेष मेडिकल खर्च का भुगतान करे। हाइकोर्ट ने कहा कि बिना कारण बताए मेडिकल रिइम्बर्समेंट से इनकार करना मनमाना है और यह संविधान के आर्टिकल 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।
जस्टिस संदीप मौदगिल ने कहा कि जीवन-रक्षक आपात परिस्थितियों में मरीज या उसके परिजन के पास PGIMER जैसे सरकारी अस्पताल में भर्ती होने की प्रतीक्षा करने का कोई वास्तविक विकल्प नहीं होता। आर्टिकल 21 के तहत जीवन का अधिकार समय पर और प्रभावी मेडिकल उपचार की गारंटी देता है। ऐसी स्थिति में यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए मजबूरी में निजी अस्पताल में इलाज कराता है तो उसे पूरे खर्च की प्रतिपूर्ति से वंचित करना परिस्थितियों के लिए दंडित करने के समान है।
यह मामला याचिकाकर्ता सुरेश कुमार से जुड़ा है, जिन्होंने वर्ष 2020 के उस आदेश को चुनौती दी, जिसके तहत उनकी कुल मेडिकल दावा राशि 4,63,770.51 के विरुद्ध मात्र 43,005 का भुगतान स्वीकृत किया गया, जबकि शेष ₹4,20,766 के भुगतान से बिना कोई कारण बताए इनकार कर दिया गया।
याचिकाकर्ता की पत्नी स्मिता पूनम को अगस्त 2014 में गंभीर हालत में दिल्ली स्थित इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया। आपात सर्जरी के दौरान उनका गर्भाशय और पित्ताशय निकाला गया तथा हर्निया का ऑपरेशन भी किया गया। स्थिति अत्यंत गंभीर होने के कारण याचिकाकर्ता के पास न तो किसी सूचीबद्ध अस्पताल में जाने का समय था और न ही पूर्व अनुमति लेने का अवसर।
याचिकाकर्ता द्वारा जब मेडिकल बिल उप-मंडल अधिकारी (सिविल), करनाल के समक्ष प्रस्तुत किए गए तो यह कहकर आपत्तियां उठाई गईं कि अस्पताल सूचीबद्ध नहीं है और आपातकालीन प्रमाण-पत्र आवश्यक है। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सिविल सर्जन, करनाल से आपातकालीन प्रमाण-पत्र प्राप्त कर पुनः दावा प्रस्तुत किया। इसके बावजूद कई वर्षों तक मामले को लंबित रखा गया। अंततः 18 मई 2020 को बिना सुनवाई का अवसर दिए केवल आंशिक भुगतान स्वीकृत किया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि इलाज वास्तविक, जीवन-रक्षक और आपात स्थिति में किया गया तथा बिना कारण रिइम्बर्समेंट से इनकार करना मनमाना है। इस दौरान हुए अत्यधिक विलंब से उन्हें आर्थिक कठिनाई और मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों शिवा कांत झा बनाम भारत संघ तथा स्टेट ऑफ पंजाब बनाम मोहिंदर सिंह चावला पर भरोसा करते हुए कहा गया कि आपात मामलों में तकनीकी आधार पर भुगतान से इनकार नहीं किया जा सकता।
राज्य सरकार ने यह तर्क दिया कि अपोलो अस्पताल उस समय सूचीबद्ध नहीं था और भुगतान हरियाणा मेडिकल रिइम्बर्समेंट पॉलिसी के अनुसार पीजीआईएमईआर/एम्स दरों पर किया गया। हालांकि हाइकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि इलाज की वास्तविकता और बिलों की प्रामाणिकता विवादित नहीं है तथा मरीज को विषम परिस्थितियों में भर्ती कराया गया, जिससे सूचीबद्ध अस्पताल जाने का कोई विकल्प नहीं बचा था।
हाइकोर्ट ने कहा कि आपात स्थिति में मरीजों को सख्ती से PGIMER या एम्स की दरों तक सीमित करना व्यावहारिक नहीं है, विशेषकर तब जब ऐसे संस्थान अत्यधिक बोझ से ग्रस्त हों और तुरंत इलाज उपलब्ध न हो सके। कोर्ट ने कई वर्षों की देरी पर भी गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि यह प्रशासनिक लापरवाही आर्टिकल 21 के उल्लंघन को और गहरा करती है।
अंततः, हाइकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह शेष ₹4,20,766 की राशि का भुगतान करे और दावा देय होने की तिथि से वास्तविक भुगतान तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी अदा करे। भुगतान चार सप्ताह के भीतर आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के बाद किया जाना होगा।