POCSO मामलों में नरमी की कोई गुंजाइश नहीं: पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने नाबालिग से यौन उत्पीड़न के आरोपी को जमानत देने से इनकार किया
पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने नाबालिग से यौन उत्पीड़न के एक गंभीर मामले में आरोपी को जमानत देने से इनकार करते हुए सख्त रुख अपनाया। हाइकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि POCSO मामलों में “नरम रवैया पूरी तरह अनुचित है।”
जस्टिस नीरजा के. काल्सन ने कहा,
“न्यायपालिका पर यह गंभीर जिम्मेदारी है कि वह उन लोगों की संरक्षक बने, जो स्वयं अपनी रक्षा करने में असमर्थ हैं। जब किसी बच्चे की मासूमियत को ठेस पहुंचती है, तब कानून को केवल दंडात्मक नहीं, बल्कि एक अडिग ढाल के रूप में कार्य करना चाहिए। समाज की आत्मा इस बात से आंकी जाती है कि वह अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करता है। ऐसे मामलों में नरमी का कोई स्थान नहीं है।”
मामला
यह याचिका भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 483 के तहत दायर की गई। यह मामला वर्ष 2024 में झज्जर जिले के सिटी झज्जर थाना में दर्ज FIR से जुड़ा है। आरोपी पर POCSO Act की धारा 6 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएं 137, 64(2)(एम), 65(1) और 87 के तहत आरोप लगाए गए।
अभियोजन के अनुसार, 13 वर्षीय बच्ची की मां ने FIR दर्ज कराई जिसमें बताया गया कि उसकी बेटी लापता हो गई। संदेह है कि आरोपी उसे बहला-फुसलाकर ले गया। इस संदेह को इस बात से बल मिला कि आरोपी भी अपने घर से गायब था।
आरोपी को 25 दिसंबर, 2024 को गिरफ्तार किया गया और तब से वह न्यायिक हिरासत में है। जांच पूरी होने के बाद 4 अप्रैल, 2025 को आरोपपत्र दाखिल किया गया और मामला ट्रायल कोर्ट को सौंप दिया गया।
ट्रायल के दौरान पीड़िता ने अदालत में बयान देते हुए अभियोजन के मामले का पूरा समर्थन किया। उसने बताया कि आरोपी उसे दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कई स्थानों पर ले गया किराये के कमरों में रखा और उसकी मर्जी के बिना बार-बार यौन उत्पीड़न किया।
बचाव पक्ष ने जमानत की मांग करते हुए तर्क दिया कि आरोपी लगभग 13 महीने से जेल में है और अब तक अभियोजन के केवल 23 में से 5 गवाहों की ही गवाही हुई। इसके अलावा पीड़िता के प्रारंभिक बयान का हवाला दिया गया जिसमें उसने कथित तौर पर कहा कि वह अपनी मर्जी से घर से गई।
हाइकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि गंभीर POCSO मामलों में केवल लंबी हिरासत जमानत का आधार नहीं हो सकती, खासकर जब ट्रायल चल रहा हो और अभियोजन की ओर से कोई जानबूझकर देरी न की गई हो।
हाइकोर्ट ने साफ कहा कि POCSO Act के तहत 18 वर्ष से कम उम्र का बच्चा कानूनन सहमति देने में सक्षम नहीं होता। इसलिए “स्वेच्छा” या “मर्जी से जाने” जैसे तर्क कानूनी रूप से अप्रासंगिक हैं।
पीठ ने कहा,
“पीड़िता की ट्रायल कोर्ट में शपथपूर्वक दी गई गवाही को प्राथमिकता दी जाएगी। प्रारंभिक बयानों में मामूली विरोधाभास जमानत के स्तर पर उसकी विश्वसनीयता को कम नहीं करते।”
हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि POCSO Act एक विशेष और सख्त कानून है जिसमें जमानत पर विचार करते समय अत्यधिक सतर्कता जरूरी है। इस स्तर पर आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण बाल पीड़ित की सुरक्षा और विधायी मंशा है।
जमानत याचिका खारिज करते हुए हाइकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाई जाए और इसे यथासंभव छह महीने के भीतर पूरा किया जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि प्रत्येक प्रभावी सुनवाई तिथि पर कम से कम चार अभियोजन गवाहों की गवाही कराई जाए।