कागज़ की बर्बादी रोकने के लिए एक ही शीट पर आदेश छापना सराहनीय: पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट

Update: 2026-01-31 07:26 GMT

पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने न्यायिक आदेशों को एक ही कागज़ की शीट पर छापकर कागज़ की अनावश्यक बर्बादी रोकने के लिए सेशन जज की सराहना की। हाइकोर्ट ने इसे न्यायिक कार्यप्रणाली में संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का अनुकरणीय उदाहरण बताया।

जस्टिस नीरजा के. काल्सन ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध आदेशों से स्पष्ट है कि संबंधित अधिकारी ने कागज़ के अधिकतम और संतुलित उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए हर संभव सावधानी बरती। जहां भी संभव हुआ, आदेश एक ही शीट पर मुद्रित किए गए।

जस्टिस काल्सन ने कहा कि यह सराहनीय उदाहरण है जिसका प्रत्येक कोर्ट को अनुसरण करना चाहिए, क्योंकि कागज़ बहुमूल्य संसाधन है और न्यायिक कार्यवाही में इसके प्रति संवेदनशीलता आवश्यक है।

हाइकोर्ट भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें लुधियाना की एडिशनल सेशन जज (स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट) द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत याचिकाकर्ता को घोषित अपराधी करार दिया गया। यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 363, 366-ए और POCSO Act की धारा 12 के तहत दर्ज किया गया।

FIR अभियोजन पक्ष की पीड़िता के पिता की शिकायत पर दर्ज हुई, जिसमें आरोप लगाया गया कि उसकी बेटी का अपहरण कर उसे बहला-फुसलाकर ले जाया गया। याचिकाकर्ता का दावा था कि वह महिला के साथ सहमति से संबंध में था> परिवार की आपत्ति के कारण महिला स्वयं घर छोड़कर उसके साथ गई।

याचिकाकर्ता को प्रारंभ में गिरफ्तार किया गया। हालांकि, बाद में उसे जमानत दे दी गई। इसके बाद पीड़िता के पिता ने दोनों का विवाह गुरुद्वारा साहिब में करवा दिया। इस बीच मामला सेशन कोर्ट में विचाराधीन हुआ और आरोप तय किए गए।

बाद में याचिकाकर्ता ने विवाह के आधार पर FIR रद्द करने के लिए हाइकोर्ट का रुख किया, जिस पर अंतरिम राहत दी गई। हालांकि वर्ष 2019 में यह राहत तब समाप्त कर दी गई, जब बताया गया कि याचिकाकर्ता विदेश चला गया और उसकी ओर से कोई पेशी नहीं हो रही है।

वर्ष 2024 में यह तथ्य सामने आया कि 12 अप्रैल, 2021 को याचिकाकर्ता को घोषित अपराधी करार दिया गया, जिसके बाद वर्तमान याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि अमेरिका जाने से पहले उसे अंतरिम राहत समाप्त होने की जानकारी नहीं थी और मजबूरीवश वह परिवार से संपर्क में भी नहीं रह सका।

रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद हाइकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने यह संतोष दर्ज नहीं किया कि याचिकाकर्ता फरार था या गिरफ्तारी से बचने के लिए स्वयं को छिपा रहा था, जो कि उद्घोषणा जारी करने के लिए अनिवार्य शर्त है।

हाइकोर्ट ने कहा कि एडिशनल सेशन जज द्वारा न तो गिरफ्तारी वारंट के निष्पादन में विफलता का कोई प्रमाण रिकॉर्ड पर लाया गया और न ही यह दर्शाया गया कि याचिकाकर्ता जानबूझकर कानून से बच रहा था। बिना अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन किए सीधे उद्घोषणा जारी करना जल्दबाज़ी और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है।

जस्टिस काल्सन ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को घोषित अपराधी घोषित करना उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर प्रभाव डालता है, इसलिए प्रक्रिया में निर्धारित सभी औपचारिकताओं का सख्ती से पालन अनिवार्य है।

यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता स्वयं आगे आकर प्रत्येक तारीख पर ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश होने का आश्वासन दे रहा है, हाइकोर्ट ने घोषित अपराधी संबंधी आदेश रद्द कर दिया। साथ ही निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता दो सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में पेश होकर जमानत के लिए आवेदन करे और ट्रायल कोर्ट उसकी जमानत अर्जी पर कानून के अनुसार शीघ्र निर्णय करे।

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