मौखिक गवाही के बिना दस्तावेजी साक्ष्य खुद को साबित नहीं कर सकते: पटना हाईकोर्ट ने बर्खास्त बैंक कर्मचारी को बहाल करने का दिया आदेश
पटना हाईकोर्ट ने पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के उस कर्मचारी की बर्खास्तगी रद्द की, जिसे भर्ती परीक्षा में कथित प्रतिरूपण यानी किसी दूसरे व्यक्ति की जगह परीक्षा देने के आरोप में नौकरी से हटाया गया।
जस्टिस कुमार मनीष की एकल पीठ ने कहा कि विभागीय जांच में आरोप साबित करने के लिए जिस प्रमुख साक्ष्य पर भरोसा किया गया, उसे उचित तरीके से साबित ही नहीं किया गया।
कोर्ट कर्मचारी की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें 31 मार्च, 2018 के बर्खास्तगी आदेश को चुनौती दी गई। इस आदेश के तहत कर्मचारी को सेवा से हटाने के साथ भविष्य में रोजगार पाने के लिए भी अयोग्य घोषित कर दिया गया। उस पर आरोप था कि उसने भर्ती परीक्षा में किसी अन्य व्यक्ति से अपनी जगह परीक्षा दिलवाई थी।
याचिकाकर्ता ने वर्ष 2013 में आईबीपीएस की मैनेजमेंट ट्रेनी/प्रोबेशनरी ऑफिसर भर्ती के लिए आयोजित कॉमन रिटन एग्जामिनेशन में आवेदन किया। उसने लिखित परीक्षा और साक्षात्कार उत्तीर्ण किया जिसके बाद वर्ष 2014 में पंजाब नेशनल बैंक में उसकी नियुक्ति हुई। उसने फरवरी 2015 में बैंक में कार्यभार संभाला।
बाद में बैंक को शिकायत मिली कि लिखित परीक्षा में याचिकाकर्ता की जगह किसी अन्य व्यक्ति ने परीक्षा दी थी। इस शिकायत के बाद केंद्रीय फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (CFSL) शिमला ने संबंधित हस्ताक्षरों की जांच की। प्रयोगशाला ने राय दी कि मानक हस्ताक्षर लिखने वाले व्यक्ति ने विवादित हस्ताक्षर नहीं लिखे थे। दूसरी ओर, केंद्रीय फिंगरप्रिंट ब्यूरो ने पाया कि विवादित अंगूठे के निशान धुंधले थे और उनमें तुलना के लिए पर्याप्त रेखीय विवरण उपलब्ध नहीं था।
इसके बाद बैंक ने कर्मचारी के खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की। आरोप का एकमात्र आधार यह था कि याचिकाकर्ता ने वर्ष 2013 की परीक्षा में प्रतिरूपण करवाया था। विभाग की ओर से प्रस्तुतकर्ता अधिकारी ने जांच अधिकारी के समक्ष आठ दस्तावेज पेश किए, जिनमें CFSL की हस्तलेखन जांच रिपोर्ट भी शामिल थी। हालांकि आरोप साबित करने के लिए किसी भी गवाह की गवाही दर्ज नहीं कराई गई।
हाईकोर्ट ने इसे साक्ष्य से जुड़ी गंभीर खामी माना। कोर्ट ने कहा कि CFSL रिपोर्ट तैयार करने वाले हस्तलेखन विशेषज्ञ को न तो गवाही के लिए बुलाया गया और न ही किसी अन्य ऐसे गवाह को पेश किया गया जो रिपोर्ट को प्रमाणित कर सके या उसकी व्याख्या कर सके। इसके परिणामस्वरूप याचिकाकर्ता को विशेषज्ञ की राय पर जिरह करने का अवसर भी नहीं मिला।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि CFSL की राय विशेषज्ञ साक्ष्य के रूप में प्रासंगिक हो सकती है, लेकिन अदालत के सामने सवाल यह नहीं है कि दोनों हस्ताक्षर वास्तव में अलग हैं या नहीं। महत्वपूर्ण बात यह है कि रिपोर्ट के लेखक या उसे साबित करने में सक्षम किसी अन्य गवाह की गवाही के बिना ही इस रिपोर्ट को आरोप के समर्थन में ठोस साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया गया।
खंडपीठ ने यह भी गौर किया कि केंद्रीय फिंगरप्रिंट ब्यूरो ने याचिकाकर्ता की पहचान के खिलाफ कोई प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं दिया। ब्यूरो ने विवादित अंगूठे के निशानों को तुलना के लिए अनुपयुक्त पाया था। इसलिए फिंगरप्रिंट से संबंधित सामग्री भी प्रतिरूपण के आरोप की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करती।
विभागीय जांच में दस्तावेजों को साबित करने से जुड़े कानूनी सिद्धांतों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि CFSL रिपोर्ट को उचित मौखिक साक्ष्य के जरिए प्रमाणित किए बिना उस पर भरोसा करना बैंक की ओर से की गई गंभीर प्रक्रियात्मक और साक्ष्य संबंधी त्रुटि थी।
कोर्ट के अनुसार, केवल दस्तावेज को रिकॉर्ड पर रख देना पर्याप्त नहीं है, जब आरोप साबित करने के लिए उसकी विषयवस्तु और विश्वसनीयता की विधिवत पुष्टि आवश्यक हो।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 12 दिसंबर, 2017 की जांच रिपोर्ट और उसके परिणामस्वरूप पारित बर्खास्तगी आदेश को कायम रखने योग्य नहीं माना।
कोर्ट ने कहा कि जिस प्रमुख साक्ष्य के आधार पर आरोप साबित किया गया, वह विभागीय जांच में विधिवत साबित ही नहीं हुआ। अपीलीय प्राधिकारी द्वारा वैधानिक अपील को केवल समय-सीमा के आधार पर खारिज कर देना भी इस मूल खामी को दूर नहीं कर सकता।
मामले में बीते लंबे समय और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि साक्ष्य संबंधी कमी प्रबंधन की ओर से आरोप के मूल आधार को साबित न कर पाने के कारण उत्पन्न हुई थी, हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि नए सिरे से विभागीय जांच कराना उचित नहीं होगा।
अदालत ने कर्मचारी की बर्खास्तगी और अपीलीय आदेश, दोनों को रद्द कर दिया। साथ ही संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को उसके पूर्व पद या समकक्ष पद पर बहाल किया जाए। उसे सेवा की निरंतरता और उससे जुड़े परिणामी सेवा लाभ भी दिए जाएं।