किशोर न्याय कानून का उद्देश्य सुधार, सजा नहीं; केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता: पटना हाईकोर्ट

Update: 2026-06-26 12:30 GMT

पटना हाईकोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 (JJ Act) का उद्देश्य कानून से संघर्षरत बच्चों को दंडित करना नहीं, बल्कि उनका सुधार और पुनर्वास करना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आरोपित अपराध की गंभीरता या किशोर की आयु जमानत देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकती।

जस्टिस जितेंद्र कुमार ने हत्या के मामले में आरोपी किशोर की जमानत याचिका खारिज किए जाने के खिलाफ दायर अपील पर यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। हालांकि मामले के तथ्यों को देखते हुए अदालत ने ट्रायल कोर्ट का आदेश बरकरार रखते हुए अपील खारिज की।

मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 103(1) और 61(2) तथा शस्त्र अधिनियम की धारा 27 के तहत दर्ज हत्या के एक मामले से जुड़ा है।

अभियोजन के अनुसार किशोर का नाम सह-आरोपी के कथित स्वीकारोक्ति बयान के आधार पर सामने आया। बाल न्यायालय ने सामाजिक जांच रिपोर्ट पर भी भरोसा किया, जिसमें कहा गया कि किशोर आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की संगति में था, पढ़ाई छोड़ चुका था और नशे का आदी था।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसका नाम FIR में नहीं है, उसकी पहचान परेड भी नहीं कराई गई और JJ Act की धारा 12 में जमानत से इनकार के लिए निर्धारित कोई भी आधार इस मामले में मौजूद नहीं है।

वहीं, राज्य सरकार ने किशोर के आपराधिक रिकॉर्ड, सामाजिक जांच रिपोर्ट और यह तथ्य सामने रखा कि उसके माता-पिता झारखंड में रहते हैं तथा उसके लिए प्रभावी अभिभावकीय देखरेख उपलब्ध नहीं है।

धारा 12 की व्याख्या करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान सामान्य आपराधिक कानून में जमानत संबंधी प्रावधानों पर प्रभावी है। अधिनियम के तहत किशोर को जमानत देना सामान्य नियम है, जबकि जमानत से इनकार अपवाद है।

अदालत ने कहा कि जमानत केवल तभी रोकी जा सकती है, जब रिहाई से बच्चे के ज्ञात अपराधियों की संगति में जाने, नैतिक, शारीरिक या मानसिक खतरे में पड़ने अथवा न्याय के उद्देश्य प्रभावित होने की आशंका हो।

हाईकोर्ट ने कहा,

“आरोपित अपराध की गंभीरता या किशोर की आयु, धारा 12 के तहत जमानत से इनकार करने के लिए प्रासंगिक आधार नहीं हैं। यहां तक कि 16 वर्ष या उससे अधिक आयु का वह किशोर, जिस पर जघन्य अपराध का आरोप हो, भी अधिनियम की धारा 12 के तहत जमानत पाने का अधिकार रखता है।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किशोर न्याय अधिनियम में प्रयुक्त “न्याय के उद्देश्य” की अवधारणा को अधिनियम के सुधारात्मक और पुनर्वास संबंधी उद्देश्य के अनुरूप समझा जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा,

“कोई भी समाज अपने बच्चों को दंडित करने का जोखिम नहीं उठा सकता। कानून से संघर्षरत बच्चों के प्रति दंडात्मक दृष्टिकोण अंततः समाज के लिए ही विनाशकारी साबित होगा।”

अदालत ने यह भी कहा कि किसी बच्चे के पुनर्वास में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। यद्यपि प्रेक्षण गृह अधिनियम के तहत एक व्यवस्था है, लेकिन बच्चे की देखभाल, संरक्षण और समाज में पुनर्स्थापना के लिए परिवार सर्वोत्तम संस्था है। इसलिए प्रत्येक ऐसे बच्चे को यथाशीघ्र परिवार से मिलाने का प्रयास किया जाना चाहिए।

हालांकि, वर्तमान मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि किशोर पर हत्या के अलावा हत्या के प्रयास से जुड़े दो अन्य आपराधिक मामलों में भी आरोप हैं। सामाजिक जांच रिपोर्ट में उसके आपराधिक तत्वों की संगति और नशे की लत का भी उल्लेख है। साथ ही उसके लिए अनुकूल पारिवारिक वातावरण और प्रभावी अभिभावकीय देखरेख का अभाव भी सामने आया।

इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि फिलहाल प्रेक्षण गृह में रहना ही किशोर के सुधार और पुनर्वास के लिए अधिक उपयुक्त होगा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने जमानत देने से इनकार करने का आदेश बरकरार रखते हुए अपील खारिज की।

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