धार्मिक जुलूस निकालने का अधिकार पूर्ण नहीं, कानून-व्यवस्था के लिए उचित पाबंदी लगा सकता है राज्य: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने महाबीरी जुलूस को लेकर दायर याचिका खारिज करते हुए कहा कि धार्मिक जुलूस निकालने का अधिकार संविधान के तहत संरक्षित है लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है।
सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य उचित प्रतिबंध लगा सकता है।
जस्टिस आलोक कुमार की एकल पीठ ने सीवान जिले में महाबीरी जुलूस को लेकर लगाए गए प्रतिबंधों में हस्तक्षेप करने से इनकार किया।
याचिकाकर्ता सीवान के हथौरा गांव स्थित अखाड़ा नंबर-1 के श्रद्धालु हैं। उन्होंने पारंपरिक मार्ग से महाबीरी जुलूस निकालने की अनुमति देने और इसमें कम-से-कम 300 श्रद्धालुओं को शामिल होने की अनुमति देने का निर्देश देने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि भाद्रपद कृष्ण पक्ष की 11वीं तिथि को जुलूस निकालने के लिए वर्ष 1958 से हर साल अनुमति दी जाती रही है। वर्ष 2012 और 2013 में 200 श्रद्धालुओं को जुलूस में शामिल होने की अनुमति थी। इसके बाद यह संख्या वर्ष 2014 में 150, वर्ष 2015 में 100 और वर्ष 2023 से घटाकर केवल पांच कर दी गई। पारंपरिक मार्ग में भी बदलाव किए जाने का आरोप लगाया गया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि पारंपरिक मार्ग को लेकर कभी शांति भंग की शिकायत नहीं हुई। आरोप लगाया गया कि अगस्त 2023 में हुई शांति समिति की बैठक में श्रद्धालुओं को पांच लोगों की सीमा और बदले हुए मार्ग पर सहमत होने के लिए मजबूर किया गया तथा ऐसा नहीं करने पर अनुमति नहीं देने की बात कही गई।
वहीं राज्य सरकार ने प्रतिबंधों का बचाव करते हुए कहा कि ये कदम कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए उठाए गए। सरकार के अनुसार, वर्ष 2015 से 2022 के बीच पांच श्रद्धालुओं की अनुमति के बावजूद करीब 1,700 से 2,000 लोग जुलूस में शामिल हुए, जिसके कारण कई मामले दर्ज हुए।
राज्य ने वर्ष 2024 की घटना का भी उल्लेख किया। उसके अनुसार याचिकाकर्ता और उनके साथ मौजूद भीड़ ने हुसैनगंज के प्रखंड विकास पदाधिकारी के सरकारी वाहन में आग लगाई और पुलिसकर्मियों पर पथराव किया।
सरकार ने कहा कि पांच लोगों की सीमा भेदभावपूर्ण नहीं बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से उठाया गया कदम है और यह प्रतिबंध सदर, सीवान के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी की जांच के बाद लगाया गया।
दोनों पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, लेकिन यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के डॉ. एम. इस्माइल फारूकी बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान किसी धार्मिक आचरण को संरक्षण देता है लेकिन इससे उस अधिकार को हर तरीके और हर परिस्थिति में इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं मिल जाता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धार्मिक या नागरिक जुलूस निकालने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(बी) और अनुच्छेद 25 के तहत मान्य है, लेकिन इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
कोर्ट ने कहा,
“कोई भी संवैधानिक अधिकार पूर्ण नहीं है; बिना नियंत्रण की स्वतंत्रता समाज के लिए गंभीर नुकसान का कारण बन सकती है।”
पीठ ने यह भी दोहराया कि धर्मनिरपेक्षता संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। राज्य सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार करता है और प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन तथा प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है लेकिन यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े संवैधानिक दायित्वों के अधीन रहती है।
भविष्य में भी केवल पांच श्रद्धालुओं को जुलूस में शामिल होने की अनुमति दिए जाने की आशंका पर हाईकोर्ट ने कहा कि यह शिकायत अभी समय से पहले है।
जब अगली बार जुलूस की अनुमति मांगी जाएगी उस समय इलाके की कानून-व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को देखते हुए श्रद्धालुओं की संख्या तय की जाएगी।
कोर्ट ने कहा कि भविष्य की संभावित स्थिति के आधार पर अभी इस मुद्दे पर फैसला नहीं किया जा सकता। याचिका में कोई ठोस आधार नहीं मिलने पर हाईकोर्ट ने इसे खारिज किया।
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