'शराब व्यक्तिगत पसंद, लेकिन सार्वजनिक असुविधा नहीं'—रिक्रिएशन क्लब का लाइसेंस रद्द: मद्रास हाईकोर्ट

Update: 2026-04-01 08:33 GMT

मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में मनोरंजन क्लब को दिए गए शराब लाइसेंस (FL2) को रद्द करते हुए कहा है कि शराब पीना भले ही व्यक्तिगत पसंद हो, लेकिन इससे किसी इलाके के निवासियों को असुविधा या खतरा नहीं होना चाहिए।

जस्टिस एन. सतीश कुमार और जस्टिस एम. जोतिरामन की खंडपीठ मदुरै के थंडलाई गांव स्थित PONS Recreation Club को दिए गए लाइसेंस के खिलाफ दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह इलाका जल्लिकट्टू जैसी सांस्कृतिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है और स्थानीय लोग शराब की दुकान खोलने के खिलाफ थे। पंचायत ने भी राज्य सरकार द्वारा TASMAC दुकान खोलने के विरोध में प्रस्ताव पारित किया था। इसके बावजूद क्लब को FL2 लाइसेंस जारी कर दिया गया, जो नियमों के विरुद्ध और स्थानीय जनभावनाओं के खिलाफ है।

याचिकाकर्ताओं का यह भी कहना था कि तमिलनाडु लिकर (लाइसेंस और परमिट) नियम, 1981 के नियम 19(2) के अनुसार किसी क्लब को लाइसेंस पाने के लिए कम से कम तीन वर्ष से संचालित होना आवश्यक है, जबकि संबंधित क्लब केवल एक वर्ष पुराना था और नियमों से बचने के लिए उसका नाम बदला गया था। साथ ही, लाइसेंस जारी करते समय स्थानीय जरूरत और सार्वजनिक हित पर कोई समुचित जांच नहीं की गई।

वहीं, राज्य सरकार ने दलील दी कि लाइसेंस निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए दिया गया और क्लब वर्ष 2009 से अस्तित्व में था, केवल उसका नाम बदला गया था।

अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि क्लब वास्तव में केवल एक वर्ष पुराना था और पुलिस द्वारा जारी अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) भी स्पष्ट नहीं था। साथ ही, क्लब के बायलॉज में शराब बेचने का कोई उद्देश्य शामिल नहीं था।

कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि तमिलनाडु में निजी व्यक्तियों को सीधे शराब की दुकान चलाने की अनुमति नहीं है, जिसके चलते लोग मनोरंजन क्लब बनाकर शराब बेचने का लाइसेंस प्राप्त कर रहे हैं, जिससे स्थानीय निवासियों और राहगीरों को असुविधा होती है।

अदालत ने कहा कि लाइसेंस जारी करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि स्थानीय जरूरत मौजूद हो, सार्वजनिक हित प्रभावित न हो और लाइसेंस का दुरुपयोग न हो। चूंकि इन पहलुओं पर विचार नहीं किया गया, इसलिए लाइसेंस को बिना समुचित आवेदन और नियमों के पालन के जारी किया गया।

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने लाइसेंस को रद्द कर दिया। यह फैसला स्पष्ट करता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ-साथ सार्वजनिक हित और स्थानीय शांति को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

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