श्रीदेवी की संपत्ति पर दावा करने वाली याचिका खारिज करने की मांग लेकर मद्रास हाईकोर्ट पहुंचे बोनी कपूर और उनकी बेटियां

Update: 2026-03-17 03:27 GMT

फिल्म प्रोड्यूसर बोनी कपूर और उनकी बेटियां जान्हवी और खुशी कपूर चेंगलपट्टू के एडिशनल जिला जज के आदेश के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट पहुंचे हैं। इस आदेश में जज ने ईस्ट कोस्ट रोड के पास दिवंगत एक्ट्रेस श्रीदेवी की संपत्ति के संबंध में दायर याचिका खारिज करने से इनकार किया था।

सोमवार (16 मार्च) को जब यह याचिका जस्टिस टीवी तमिलसेल्वी के सामने सुनवाई के लिए आई तो कोर्ट ने मामले को अंतिम निपटारे के लिए 26 मार्च, 2026 को उठाने का फैसला किया और मामले में चल रही सुनवाई (ट्रायल) पर रोक लगाने वाले अंतरिम आदेश को आगे बढ़ा दिया।

चेंगलपट्टू कोर्ट में यह मामला एमसी शिवकामी, उनकी बहन एमसी नटराजन और उनकी मां चंद्रभानु ने दायर किया था। उन्होंने जमीन में हिस्सेदारी का दावा किया और उन 4 बिक्री दस्तावेजों (सेल डीड्स) को रद्द घोषित करने की मांग की, जिनके जरिए श्रीदेवी और उनकी बहन ने 4.7 एकड़ की यह संपत्ति हासिल की थी। दावा किया गया कि ये बिक्री दस्तावेज फर्जी थे और संपत्ति में उनका भी हिस्सा है, क्योंकि यह उनके दादा की थी।

इस मुकदमे को खारिज करने की मांग करते हुए कपूर ने CPC के आदेश 7 नियम 11 (a) और (b) तथा धारा 151 के तहत आवेदन दायर किया। कपूर ने दावा किया कि वादियों का दावा कानूनी रूप से टिकने लायक नहीं है और चंद्रभानु का विवाह ही अमान्य था, क्योंकि यह उनके पहले विवाह के अस्तित्व में रहते हुए किया गया; इस प्रकार कानून के तहत यह शुरू से ही अमान्य (Void Ab Initio) है और यह द्विविवाह (Bigamy) का कृत्य माना जाता है।

कपूर ने दावा किया कि इस तथ्य को याचिका में छिपाया गया, और किसी महत्वपूर्ण तथा कानूनी रूप से प्रासंगिक तथ्य को इस तरह छिपाना कोर्ट को गुमराह करने का जानबूझकर किया गया प्रयास है। उन्होंने दावा किया कि यह कृत्य धोखाधड़ी के बराबर है, जो दावे की पूरी बुनियाद को ही कमजोर कर देता है।

कपूर ने 37 साल बाद याचिका दायर किए जाने पर भी सवाल उठाया, जिसमें 1988 के दस्तावेजों को चुनौती दी गई; इससे यह याचिका समय-सीमा (Limitation) के आधार पर खारिज होने योग्य बन जाती है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यद्यपि वादी ने दावा किया कि बिक्री दस्तावेज और पट्टा (Patta) धोखाधड़ी के जरिए हासिल किए गए, लेकिन पट्टा तहसीलदार द्वारा पूरी जांच-पड़ताल (Due Diligence) करने और सभी संबंधित मालिकाना दस्तावेजों को सत्यापित करने के बाद ही जारी किया गया। वादी ने अर्जी को चुनौती दी और कहा कि कपूर द्वारा उठाए गए मुद्दे तथ्यों के विवादित सवाल थे, जिनकी जांच केवल ट्रायल के समय ही की जा सकती थी। यह कहा गया कि कपूर के पास यह साबित करने के लिए कोई दस्तावेज़ नहीं था कि उन्होंने संपत्ति कानूनी रूप से खरीदी थी। इस बात को छिपाने के लिए, वे पितृत्व को लेकर निजी हमले कर रहे थे।

समय सीमा (लिमिटेशन) पर तर्क के संबंध में वादी ने दलील दी थी कि ऐसी अचल संपत्ति के बंटवारे के लिए मुकदमा दायर करने की कोई समय-सीमा नहीं है, जो अभी तक बंटी न हो। यह कहा गया कि वैध दस्तावेजों के बिना, कपूर और उनका परिवार अवैध और फर्जी पट्टे का इस्तेमाल करके वाद (Plaint) को खारिज करने की मांग नहीं कर सकते।

ट्रायल कोर्ट ने गौर किया कि वाद को केवल कुछ मामलों में ही खारिज किया जा सकता है – (i) जब वाद में मुकदमे का कारण (Cause of Action) न बताया गया हो (ii) जब मांगी गई राहत का मूल्य कम आंका गया हो (iii) जब वाद पर अपर्याप्त स्टांप लगा हो (iv) जब मुकदमा कानून द्वारा वर्जित हो (v) जब वाद की दो प्रतियां न हों और (vi) जब वैधानिक प्रावधानों का पालन न किया गया हो।

ट्रायल कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि वादी के पास मुकदमा दायर करने का एक स्पष्ट कारण था और यह मुकदमा निर्धारित समय-सीमा के भीतर ही दायर किया गया। इस प्रकार, जज ने वाद खारिज करने से इनकार किया, जिसके खिलाफ यह वर्तमान याचिका दायर की गई।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले शिवकामी द्वारा रिट याचिका भी दायर की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि सड़क चौड़ी करने के लिए अधिग्रहित की गई भूमि के बदले राज्य राजमार्ग विभाग द्वारा कपूर और उनके परिवार को बढ़ा हुआ मुआवजा दिया गया। उक्त याचिका का निपटारा अदालत द्वारा कर दिया गया था, जिसमें राजमार्ग विभाग को निर्देश दिया गया कि वे शिवकामी के अभ्यावेदन पर विचार करें और उचित आदेश पारित करें।

Case Title: Boney Kapoor and Others v. MC Sivakami and Others

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