सिर्फ कॉल डिटेल रिकॉर्ड से आपराधिक साजिश साबित नहीं होती: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2026-05-07 12:08 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल कॉल डिटेल रिकॉर्ड के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक साजिश का मामला नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि जब तक बातचीत की सामग्री या “साझा आपराधिक मंशा” का ठोस प्रमाण न हो, तब तक केवल बार-बार फोन कॉल होना साजिश साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

जस्टिस हिमांशु जोशी की पीठ ने क्राइम ब्रांच में तैनात कांस्टेबल के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही और आरोपपत्र रद्द करते हुए यह फैसला सुनाया।

अदालत ने कहा,

“बातचीत की सामग्री के अभाव में केवल फोन कॉल का होना, चाहे वे कितनी भी बार हुए हों, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 61(2) के तहत आपराधिक साजिश नहीं माना जा सकता।”

मामला डकैती, अपहरण, गलत तरीके से रोकने, साजिश और साक्ष्य मिटाने जैसी धाराओं में दर्ज FIR से जुड़ा है।

प्रकरण के अनुसार, सोहल लाल नामक व्यक्ति ने शिकायत दी थी कि उसके सहयोगी मुख्तार और चालक इरफान को सिवनी पुलिस ने रोककर लूट लिया। शिकायत में कहा गया कि करीब 2 करोड़ 96 लाख रुपये में से 1 करोड़ 45 लाख रुपये पुलिसकर्मियों ने अवैध रूप से अपने पास रख लिए।

मामले की जांच वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर शुरू हुई। जांच में सामने आया कि शिकायतकर्ता और उसके सहयोगी एक वाहन में बड़ी नकदी ले जा रहे थे, जिसे हवाला रकम होने का संदेह है। यह जानकारी तत्कालीन एसडीओपी पूजा पांडे तक पहुंची, जिन्होंने टीम के साथ छापा मारा।

आरोप है कि नकदी बरामद होने के बाद छापामार दल ने समझौते के लिए रकम का 75 प्रतिशत हिस्सा मांगने की कोशिश की।

याचिकाकर्ता कांस्टेबल पर आरोप था कि उसने पहले से सूचना पहुंचाई। उसके खिलाफ मुख्य आधार कॉल डिटेल रिकॉर्ड थे, जिनमें उसके, मुखबिर और सह-आरोपियों के बीच फोन संपर्क दिखाया गया था।

बचाव पक्ष ने कहा कि कांस्टेबल न तो छापामार दल का हिस्सा था और न ही नकदी रोकने या बरामद करने में उसकी कोई भूमिका थी। उन्होंने तर्क दिया कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड केवल फोन कॉल होने की जानकारी देते हैं, लेकिन बातचीत की सामग्री नहीं बताते।

हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता ने कथित अपराध में भाग लिया। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है, जिससे यह पता चले कि आरोपी का शिकायतकर्ता पक्ष से कोई संपर्क था।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा,

“किसी अन्य सहायक साक्ष्य के बिना केवल कॉल रिकॉर्ड के आधार पर आरोपी की संलिप्तता या अपराध से संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता।”

अदालत ने माना कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे साझा मंशा, पूर्व सहमति या मिलकर कार्रवाई करने का संकेत मिले। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए आरोपी कांस्टेबल के खिलाफ आरोपपत्र और आपराधिक कार्यवाही रद्द की।

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