दुष्कर्म पीड़िता पत्नी का साथ न देना और पहली शादी रहते दूसरी शादी करना क्रूरता व परित्याग: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2026-07-30 12:12 GMT

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि पत्नी के साथ दुष्कर्म होने के बाद उसका साथ न देना और पहली शादी के रहते दूसरी शादी करना, दोनों ही वैवाहिक क्रूरता और परित्याग की श्रेणी में आते हैं।

जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने परिवार न्यायालय द्वारा दिए गए तलाक के फैसले को बरकरार रखते हुए पति की अपील खारिज की।

अदालत ने कहा,

"पहली शादी विधिक रूप से कायम रहते दूसरी महिला से विवाह करना, जैसा कि स्वयं अपीलकर्ता ने स्वीकार किया है, क्रूरता और परित्याग दोनों माना जाएगा। इसलिए परिवार न्यायालय ने परित्याग के आधार को स्वीकार नहीं कर त्रुटि की।"

मामले के अनुसार दोनों का विवाह 21 जून 2017 को एक आर्य समाज मंदिर में हुआ। चूंकि दोनों परिवार इस विवाह के खिलाफ थे, इसलिए शादी के बाद दंपति किराये के मकान में रहने लगे।

पत्नी ने आरोप लगाया कि बाद में पति ने यह कहकर उसे मायके भेज दिया कि उसके माता-पिता ने इस विवाह को स्वीकार नहीं किया। कुछ समय बाद वह उसे वापस किराये के मकान में ले आया लेकिन अक्सर शराब पीकर घर आता, मारपीट करता, गाली-गलौज करता और यह कहकर अपमानित करता कि शादी के कारण उसका परिवार उससे दूर हो गया है। आखिरकार पत्नी फिर अपने मायके लौट गई।

पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि शादी के बाद उसके साथ एक अन्य व्यक्ति ने दुष्कर्म किया। उसने इस कठिन समय में पति से मदद मांगी, लेकिन पति ने उसका साथ देने के बजाय उसे छोड़ दिया। उसने यह भी आरोप लगाया कि पति ने दहेज की मांग की और पहली शादी रहते दूसरी महिला से विवाह कर लिया। साथ ही उसका दूसरी महिला से संबंध भी था।

फैमिली कोर्ट ने पत्नी के साथ क्रूरता को साबित मानते हुए तलाक की डिक्री पारित की लेकिन परित्याग का आधार स्वीकार नहीं किया।

हाईकोर्ट में पति की ओर से दलील दी गई कि क्रूरता साबित नहीं हुई और वैवाहिक अधिकारों की बहाली संबंधी डिक्री का पालन न करना अपने आप में क्रूरता नहीं माना जा सकता।

वहीं पत्नी की ओर से कहा गया कि दुष्कर्म जैसी घटना के बाद भी पति ने उसका साथ नहीं दिया, बल्कि उसे छोड़ दिया और पहली शादी के रहते दूसरी शादी कर ली।

रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि शारीरिक और मानसिक क्रूरता के आरोप साबित होते हैं। अदालत ने कहा कि जिरह के दौरान पति ने इस बात से इनकार नहीं किया कि दुष्कर्म के बाद उसने पत्नी की कोई मदद नहीं की। इसके अलावा, दूसरी शादी के संबंध में प्रस्तुत साक्ष्यों का भी उसने प्रभावी ढंग से खंडन नहीं किया।

अदालत ने यह भी पाया कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली की डिक्री मिलने के बावजूद पति ने पत्नी के साथ दोबारा रहने का कोई वास्तविक प्रयास नहीं किया।

सुप्रीम कोर्ट के समर घोष बनाम जया घोष फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मानसिक क्रूरता तय करने का कोई निश्चित मानदंड नहीं हो सकता और प्रत्येक मामले का निर्णय उसके अपने तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।

इन सभी तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि पत्नी क्रूरता और परित्याग दोनों साबित करने में सफल रही है। इसी आधार पर पति की अपील खारिज करते हुए तलाक की डिक्री बरकरार रखी।

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