कर्ज की वापसी की मांग को आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता: मध्यप्रदेश हाइकोर्ट

Update: 2026-01-30 11:17 GMT

मध्यप्रदेश हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति द्वारा अपने कर्ज की रकम वापस मांगना या उसके बदले मृतक की मोटरसाइकिल अपने पास रखना, आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं माना जा सकता।

हाइकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत लगाए गए आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप रद्द कर दिया।

जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की एकल पीठ ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध तभी बनता है जब आरोपी की मंशा स्पष्ट रूप से मृतक को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने की हो। केवल कर्ज की वापसी की मांग को ऐसी मंशा नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि सामान्यतः पैसे की मांग किसी व्यक्ति को इतना चरम कदम उठाने के लिए प्रेरित नहीं करती। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है तो कर्ज की वसूली का उद्देश्य ही विफल हो जाता है।

अदालत ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता द्वारा मृतक से पैसा वापस मांगना या उसकी मोटरसाइकिल अपने पास रखना ऐसा कोई प्रत्यक्ष कृत्य नहीं है, जिससे यह कहा जा सके कि मृतक के पास आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

मामले के अनुसार, 13 सितंबर 2022 को रात लगभग 9 बजे मृतक ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। जांच के दौरान पुलिस ने मृतक के पांच परिजनों और दो अन्य व्यक्तियों के बयान दर्ज किए।

परिजनों ने आरोप लगाया कि मृतक ने याचिकाकर्ता से एक लाख रुपये उधार लिए थे और याचिकाकर्ता द्वारा लगातार रकम की मांग किए जाने तथा घटना वाले दिन मोटरसाइकिल रख लिए जाने के कारण मृतक ने आत्महत्या कर ली।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि निचली अदालत ने धारा 306 के आवश्यक तत्वों पर विचार किए बिना आरोप तय कर दिए। यह भी कहा गया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता ने मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाया या प्रेरित किया।

हाइकोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 107 के तहत उकसावे के अपराध के लिए यह आवश्यक है कि अभियोजन यह साबित करे कि आरोपी ने जानबूझकर ऐसा कृत्य किया, जिससे मृतक को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा। अदालत ने पाया कि इस मामले में ऐसा कोई सामग्री उपलब्ध नहीं है।

यह भी कहा गया कि यदि अभियोजन की पूरी कहानी को सही मान लिया जाए तब भी यह साबित नहीं होता कि याचिकाकर्ता की ओर से कोई ऐसा उकसाने वाला कृत्य किया गया, जिसने मृतक को आत्महत्या के लिए विवश किया हो।

इन परिस्थितियों में हाइकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा IPC की धारा 306 के तहत आरोप तय करने के आदेश को निरस्त कर दिया।

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