मौन दर्शक नहीं बन सकता: आरोपी को संरक्षण देने पर एमपी हाइकोर्ट ने पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के आदेश दिए

Update: 2026-01-31 11:05 GMT

मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने आरोपी को अवैध रूप से संरक्षण देने के गंभीर आरोपों में एक पुलिस अधिकारी के आचरण पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए उसके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए।

हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पुलिस अधिकारी न्यायालय के आदेशों को निष्प्रभावी करने का प्रयास करते हैं, तो अदालत मूक दर्शक बनी नहीं रह सकती।

जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के की एकल पीठ ने यह आदेश पारित करते हुए कहा कि संबंधित पुलिस अधिकारी का आचरण कानून के शासन, अदालत के अधिकार और निष्पक्ष जांच के बुनियादी सिद्धांतों के प्रति “चिंताजनक और खतरनाक उपेक्षा” को दर्शाता है।

मामले में पीड़िता द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाइकोर्ट ने पाया कि आरोपी के खिलाफ महिला की गरिमा भंग करने, आपराधिक धमकी देने तथा आईटी एक्ट के तहत अश्लील सामग्री के प्रकाशन और प्रसारण जैसे गंभीर आरोप हैं।

इन मामलों में आरोपी की अग्रिम जमानत अर्जी पहले ट्रायल कोर्ट द्वारा और बाद में हाइकोर्ट द्वारा भी खारिज की जा चुकी थी।

इसके बावजूद, जांच अधिकारी और थाना प्रभारी ने आरोपी को गिरफ्तार करने से परहेज किया और उसे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41A के तहत नोटिस जारी कर दिया। अदालत ने कहा कि इस कदम का वास्तविक प्रभाव आरोपी को गिरफ्तारी से संरक्षण देना था, जिससे कोर्ट द्वारा पारित आदेशों की भावना पूरी तरह से निष्फल हो गई।

हाइकोर्ट ने कहा कि जब सक्षम कोर्ट गंभीर आरोपों और उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद अग्रिम जमानत से इनकार कर चुके हों, तब जांच एजेंसी से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह धारा 41A का यांत्रिक प्रयोग कर न्यायिक आदेशों को दरकिनार कर दे। ऐसा आचरण न केवल न्यायालय के आदेशों की अवहेलना है, बल्कि इससे पक्षपात और बाहरी प्रभाव की गंभीर आशंका भी उत्पन्न होती है।

राज्य की ओर से यह दलील दी गई कि धारा 41A का नोटिस जारी किए जाने से पहले जांच पूरी हो चुकी थी और आरोपपत्र दाखिल कर दिया गय।

हालांकि, हाइकोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को पूरी तरह अस्वीकार्य और असंतोषजनक करार दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि बाद में आरोपपत्र दाखिल कर देना, जांच के दौरान की गई अवैधता को समाप्त नहीं कर सकता।

हाइकोर्ट ने टिप्पणी की कि संबंधित पुलिस अधिकारी का आचरण अधिकारों के जानबूझकर दुरुपयोग, कर्तव्य में घोर लापरवाही और पुलिस अधिकारी के रूप में अनुचित आचरण की श्रेणी में आता है, जिसका सीधा प्रभाव आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को कमजोर करने वाला है।

अदालत ने सख्त शब्दों में कहा कि पुलिस बल में अनुशासन, ईमानदारी और जवाबदेही बनाए रखना कानून के शासन की रक्षा के लिए अनिवार्य है। जब कोई पुलिस अधिकारी अदालत के आदेशों को निष्फल करने और आरोपी को बचाने जैसा व्यवहार करता है, तो मामला अत्यंत गंभीर हो जाता है और तत्काल सुधारात्मक व अनुशासनात्मक कार्रवाई की आवश्यकता होती है।

इन परिस्थितियों में हाइकोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ तत्काल विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की जाए और जांच पूरी होने तक उसे निलंबित रखा जाए।

अदालत ने यह भी आदेश दिया कि जांच अधिकारी की नियुक्ति पुलिस अधीक्षक से कम रैंक के अधिकारी से न की जाए ताकि जांच निष्पक्ष और समयबद्ध ढंग से पूरी हो सके।

इन्हीं निर्देशों के साथ याचिका का निस्तारण कर दिया गया।

Tags:    

Similar News