मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए 30 प्रतिशत इन-सर्विस कोटे से केंद्र सरकार के संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) में कार्यरत डॉक्टरों को बाहर रखने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया।

चीफ जस्टिस अल्पेश वाई. कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की खंडपीठ ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर को तय की।

याचिकाकर्ता एनएमडीसी लिमिटेड में कार्यरत डॉक्टर हैं। NMDC केंद्र सरकार का सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है। उन्होंने मध्य प्रदेश चिकित्सा शिक्षा प्रवेश नियम, 2018 में 'इन-सर्विस उम्मीदवार' की परिभाषा को चुनौती दी।

याचिका में कहा गया कि इन नियमों के तहत पात्रता केवल राज्य सरकार के विभागों या संस्थानों में कार्यरत लोगों तक सीमित कर दी गई।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि केंद्र सरकार के संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में काम करने वाले डॉक्टरों को भी 30 प्रतिशत इन-सर्विस कोटे का लाभ मिलना चाहिए। इसके लिए यह शर्त नहीं होनी चाहिए कि उनका नियोक्ता राज्य सरकार ही हो।

याचिका में बताया गया कि याचिकाकर्ता ने पन्ना जिले के एक दूरस्थ क्षेत्र स्थित परियोजना अस्पताल में चार साल से अधिक समय तक चिकित्सा सेवाएं दी हैं। उनका कहना है कि इस सेवा को भी इन-सर्विस कोटे की पात्रता तय करते समय मान्यता दी जानी चाहिए।

याचिकाकर्ता के अनुसार यह परियोजना अस्पताल पन्ना शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र के पास स्थित है। अस्पताल आसपास के गांवों और क्षेत्र में रहने तथा काम करने वाले लोगों को मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराता है। उन्होंने यह भी बताया कि अस्पताल के आसपास राज्य सरकार का कोई अस्पताल मौजूद नहीं है।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि चिकित्सा सेवा की प्रकृति, अवधि और स्थान को ध्यान में रखे बिना केवल केंद्र सरकार के संस्थानों या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में नौकरी करने के आधार पर डॉक्टरों को इन-सर्विस कोटे से बाहर करना मनमाना है और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2018 के नियमों के तहत की गई यह वर्गीकृत व्यवस्था न तो किसी स्पष्ट और तार्किक आधार पर खरी उतरती है और न ही इसका उस उद्देश्य से उचित संबंध है, जिसे हासिल करने के लिए नियम बनाए गए।

याचिकाकर्ता ने संबंधित नियमों में इन-सर्विस उम्मीदवार की परिभाषा की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए मांग की कि उन्हें NEET-PG 2026 की काउंसलिंग के शेष चरणों में अनंतिम रूप से भाग लेने की अनुमति दी जाए। उनका कहना है कि केवल केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में कार्यरत होने के आधार पर उनकी उम्मीदवारी खारिज नहीं की जानी चाहिए।

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