अभियुक्त को कानून द्वारा क्या अधिकार दिए गए हैं? महत्वपूर्ण बातें

Update: 2022-10-11 09:56 GMT

आपराधिक मामलों में जिस व्यक्ति पर अभियोजन अपना मामला लाता है उसे अभियुक्त कहा जाता है। अभियुक्त पर आपराधिक मामले का विचारण चलता है, अदालत द्वारा दोषसिद्धि या दोषमुक्ति दी जाती है। पुलिस एफआईआर दर्ज करती है, अन्वेषण करती है, न्यायालय आरोप तय करता है, अभियोजन अपना मामला साबित करता है एवं अभियुक्त बचाव करता तथा अंत में न्यायालय द्वारा निर्णय पारित किया जाता है।

इन सब के बीच कानून द्वारा अभियुक्त को कुछ अधिकार दिए गए हैं, यह अधिकार अभियुक्त को बचाने के लिए नहीं है अपितु शासन की शक्तियों पर अंकुश लगाने के लिए है एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है।

भारत की न्याय व्यवस्था आधुनिक रूप से ब्रिटिश शासन के समय से प्रारंभ हुई है। विगत डेढ़ सौ वर्ष में ऐसे बहुत से दृश्य देखने को मिले जहां एक अभियुक्त को नैसर्गिक अधिकार मिलने की आवश्यकता प्रतीत हुई। उन सभी को ध्यान रखते हुए अभियुक्त को यह अधिकार कानून द्वारा प्रदत्त किये गए हैं। इनका उल्लेख इस आलेख में बिंदुवार किया जा रहा है।

(A) गिरफ्तारी के कारण जानने का अधिकार

जब किसी व्यक्ति अथवा अभियुक्त को वारन्ट के बिना गिरफ्तार किया जाता है तो ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण जानने का अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 22 (1) में यह कहा गया है कि किसी व्यक्ति को जो गिरफ्तार किया गया है ऐसी गिरफ्तारी के कारणों से यथाशीघ्र अवगत कराये बिना अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं रखा जायेगा।

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 50 में भी ऐसा ही प्रावधान किया गया है। इसमें यह कहा गया है कि किसी व्यक्ति को वारन्ट के बिना गिरफ्तार करने वाला प्रत्येक पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति उस व्यक्ति को उस अपराध की, जिसके लिए वह गिरफ्तार किया गया है, पूर्ण विशिष्टियाँ या ऐसी गिरफ्तारी के अन्य आधार तुरन्त संसूचित करेगा।

ऐसे आधार अथवा कारण अविलम्ब बताने होंगे। यदि विलम्ब किया जाता है तो विलम्ब का स्पष्टीकरण देना होगा।

कारण अथवा आधार जानने का यह अधिकार जमानत पर छूट जाने के बाद भी बना रहता है। गिरफ्तारी के आधार अथवा कारण जानना इसलिये आवश्यक है ताकि गिरफ्तार किया जाने वाल व्यक्ति अपनी समुचित प्रतिरक्षा कर सके।

(B) वकील से परामर्श करने का अधिकार

गिरफ्तार किये गये व्यक्ति अथवा अभियुक्त का दूसरा महत्वपूर्ण अधिकार अपने पसन्द के वकील से परामर्श करने का है। संविधान के अनुच्छेद 22(1) में ही यह कहा गया है कि- गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को अपनी रुचि के एडवोकेट से परामर्श करने और प्रतिरक्षा करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जायेगा।

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 414 में भी यह प्रावधान किया गया है कि- "जब किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है और पुलिस द्वारा पूछताछ की जाती है, तब गिरफ्तार व्यक्ति अन्वेषण के दौरान उपस्थित रहने के लिए अपनी पसन्द के वकील से मिलने का हकदार होगा।

जोगिन्दर कुमार बनाम स्टेट ऑफ उत्तरप्रदेश के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा अभियुक्त के इस अधिकार की पुष्टि की गई है।

(C) परिजनों को सूचना देने का अधिकार

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 41ख (ग) में यह प्रावधान किया गया है कि- प्रत्येक पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी करते समय गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को यह सूचना देगा कि उसे यह अधिकार है कि उसके किसी नातेदार या मित्र को, जिसका वह नाम दें, उसकी गिरफ्तारी की सूचना दे दी जाए।

फिर धारा 50 (क) में यह कहा गया है कि- "प्रत्येक पुलिस अधिकारी या गिरफ्तार करने वाले किसी अन्य व्यक्ति का दायित्व होगा कि ऐसी गिरफ्तारी के सम्बन्ध में तत्काल गिरफ्तार व्यक्ति के मित्रों, सम्बन्धियों या अन्य ऐसे व्यक्तियों को जो गिरफ्तार किये गये व्यक्ति द्वारा बताये जायें या नामित किये जायें, को सूचित करें।

इस प्रकार गिरफ्तार किये गये व्यक्ति का यह अधिकार है कि उसकी गिरफ्तारी की तथा जिस स्थान पर निरुद्ध रखा गया है उसकी सूचना उसके-

(i) परिजनों

(ii) सम्बन्धियों

(ii) मित्रों अथवा

(iv) अन्य नामित व्यक्तियों को दी जाए ताकि वे प्रतिरक्षा हेतु कदम उठा सकें।

(D) मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश होने का अधिकार

संविधान के अनुच्छेद 22(2) में यह कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को, जो गिरफ्तार किया गया है और अभिरक्षा में निरुद्ध रखा गया है, गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के न्यायालय तक यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोड़कर ऐसी गिरफ्तारी से चौबीस घंटे की अवधि में निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जायेगा और ऐसे किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के प्राधिकार के बिना उक्त अवधि से अधिक के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं रखा जायेगा।

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 57 में भी ऐसा ही प्रावधान किया गया है, यथा- कोई पुलिस अधिकारी वारन्ट के बिना गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को उससे अधिक अवधि के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं रखेगा जो उस मामले की सब परिस्थितियों में उचित है तथा ऐसी अवधि मजिस्ट्रेट के धारा 167 के अधीन विशेष आदेश के अभाव में गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के न्यायालय तक यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोड़कर चौबीस घंटे से अधिक की नहीं होगी।

अभिप्राय यह हुआ कि वारन्ट के बिना गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को पुलिस अधिकारी द्वारा चौबीस घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जायेगा और मजिस्ट्रेट के विशेष आदेश के बिना उसे चौबीस घंटे से अधिक की अवधि के लिए निरुद्ध नहीं रखा जा सकेगा।

इस अवधि में गिरफ्तार किये गये स्थान से मजिस्ट्रेट के न्यायालय तक जाने में लगा समय सम्मिलित नहीं होगा।

(E) जमानत पर छूटने का अधिकार

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 50(2) में गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को जमानत पर छूटने का एक महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान किया गया है। इसमें यह कहा गया है, कि

जहाँ कोई पुलिस अधिकारी अजमानतीय अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से भिन्न किसी व्यक्ति को वारन्ट के बिना गिरफ्तार करता है, वहाँ वह गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को इतिला देगा कि वह जमानत पर छोड़े जाने का हकदार है और वह अपनी ओर से प्रतिभूओं का इन्तजाम करें।

इस प्रकार जमानतीय अपराध में वारन्ट के बिना गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को जमानत पर छूटने का अधिकार है।

(F) चिकित्सीय परीक्षण का अधिकार

संहिता की धारा 54 के अन्तर्गत गिरफ्तार किये गये व्यक्ति की चिकित्सीय परीक्षा किये जाने के बारे में प्रावधान किया गया है। ऐसी चिकित्सीय परीक्षा केन्द्रीय या राज्य सरकार के सेवाधीन चिकित्सा अधिकारी या रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी द्वारा की जायेगी।

चिकित्सा अधिकारी द्वारा ऐसी परीक्षा का अभिलेख तैयार किया जायेगा जिसमें गिरफ्तार किये गये व्यक्ति के शरीर पर किन्हीं क्षतियों या हिंसा के चिन्हों तथा अनुमानिक समय का जब ऐसी क्षति या चिन्ह पहुंचाए गये थे, वर्णन किया जायेगा।

ऐसी परीक्षा के रिपोर्ट की एक प्रति गिरफ्तार किये गये व्यक्ति या उसके द्वारा नामित व्यक्ति को दी जायेगी।

इस परीक्षा का मुख्य उद्देश्य अभियुक्त या गिरफ्तार किये गये व्यक्ति के साथ पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति द्वारा किये गये दुर्व्यवहार अथवा दी गई यातना का पता लगाते हुए उसे संरक्षण प्रदान करना है। गिरफ्तार किया गया व्यक्ति अपने चिकित्सीय परीक्षण के लिए मजिस्ट्रेट से आवेदन (प्रार्थना) कर सकता है।

(G) महिला अभियुक्त के अधिकार

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 46 के अनुसार यदि गिरफ्तार किया गया व्यक्ति या अभियुक्त महिला है तो उसकी (i) गिरफ्तारी यथासम्भव महिला कांस्टेबल द्वारा किया जाना अपेक्षित है। (ii) उसकी तलाशी भी महिला कांस्टेबल या किसी अन्य महिला द्वारा लिया जाना अपेक्षित है, तथा (iii) उसकी चिकित्सीय परीक्षा किसी महिला चिकित्सा अधिकारी द्वारा किया जाना अपेक्षित है।

(H) स्वास्थ्य एवं सुरक्षा का अधिकार

दण्ड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2008 द्वारा संहिता में एक नई धारा 55क जोड़कर यह प्रावधान किया गया है कि अभियुक्त को अभिरक्षा में रखने वाले व्यक्ति का यह कर्तव्य होगा कि - वह अभियुक्त के-

(i) स्वास्थ्य एवं

(ii) सुरक्षा की युक्तियुक्त देखभाल करें।

(I) अवैध गिरफ्तारी से संरक्षण का अधिकार

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 60(क)में यह कहा गया है कि- कोई गिरफ्तारी इस संहिता या गिरफ्तारी के लिए उपबन्ध करने वाली तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबन्धों के अनुसार, के सिवाय नहीं की जायेगी।

अभिप्राय यह हुआ कि गिरफ्तारी का विधिनुसार होना अपेक्षित है। यह धारा किसी व्यक्ति की मनमानी गिरफ्तारी पर प्रतिबंध लगाती है।

(J) निःशुल्क विधिक सहायता का अधिकार

यह ऐसे अभियुक्त का एक महत्वपूर्ण अधिकार है-

(i) जो निर्धन है, एवं

(ii) जिसके पास अधिवक्ता को नियुक्ति किये जाने के लिए पर्याप्त साधन नहीं है।

ऐसा व्यक्ति निःशुल्क विधिक सहायता प्राप्त करने का हकदार होगा। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह है कि निर्धनता अर्थात् अर्थाभाव के कारण कोई व्यक्ति न्याय से वंचित न रह जाये। किसी समय अंग्रेजी हुकूमत के दौर में अनेक अभियुक्त केवल इसलिए अधिवक्ता नियुक्त नहीं कर पाते क्योंकि वह निर्धन थे।

इस कारण वह अपने मामले की पैरवी स्वयं करते थे। अभियोजन द्वारा अपना शासन का वकील नियुक्त किया जाता था जो एक पेशेवर व्यक्ति होता है, ऐसे में एक आम आदमी एक पेशेवर व्यक्ति कैसे मुकदमा जीत सकता है। इस विपत्ति से निपटने के उद्देश्य से ही यह प्रावधान किए गए हैं।

संविधान के अनुच्छेद 39(क) में यह कहा गया है कि राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और वह विशिष्टतया यह सुनिश्चित करने के लिए कि आर्थिक या किसी अन्य नियोग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाये, उपयुक्त विधान या स्कीम द्वारा या किसी अन्य रीति से निःशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा। इस प्रकार निःशुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करने का दायित्व राज्य पर है।

(K) त्वरित विचारण का अधिकार

मामलों का त्वरित विचारण अभियुक्त का मूल अधिकार है। मामलों के विचारण में अत्यधिक विलम्ब से लोगों की न्यायपालिका के प्रति आस्था गिरने लगती है। अतः मामलों के त्वरित निस्तारण की दिशा में कदम उठाया जाना आवश्यक है।

अपराधिक मामलों के विचारण में विलम्ब से व्यक्ति वैयक्तिक स्वतंत्रता एवं जीवन से वंचित हो जाता है। अतः विचारण स्वतंत्र, निष्पक्ष, तत्पर एवं न्यायसम्मत होना चाहिये मामलों का उचित एवं त्वरित विचारण न्याय प्रशासन की एक अहम् आवश्यकता एवं अपेक्षा है।

आर डी उपाध्याय बनाम स्टेट ऑफ आंध्रप्रदेश के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा ऐसे व्यक्तियों को सूचीबद्ध करने की आवश्यकता जताई गई है जो लम्बे समय से जेलों में बन्द हैं और विचारण लम्बित है।

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