क्या पॉवर ऑफ अटॉर्नी या फिर फुल पेमेंट एग्रीमेंट पर प्रॉपर्टी खरीदना चाहिए

Update: 2022-01-05 04:30 GMT

प्रॉपर्टी के सौदे किसी भी व्यक्ति के सारे जीवन की जमा की गई पूंजी से होते हैं। यह सौदे बहुत बड़ी धन राशि में होते हैं। इन सौदों को किए जाते समय बहुत सावधानी रखे जाने की जरूरत होती है।

किसी भी प्रॉपर्टी को खरीदने पर स्टांप ड्यूटी अदा करनी होती है तब उस प्रॉपर्टी को सरकार द्वारा रजिस्ट्रीकरण एक्ट के अंतर्गत रजिस्टर्ड किया जाता है। स्टांप ड्यूटी बचाने के लिए कुछ लोगों द्वारा पॉवर ऑफ अटॉर्नी के जरिए प्रॉपर्टी खरीदना या फिर फुल पेमेंट एग्रीमेंट पर प्रॉपर्टी खरीदना जैसे चलन देखने को मिलते हैं।

अगर भारत के कानून की निगाह से देखें तो यह सरासर गलत है और इसका परिणाम यह हो सकता है कि किसी भी आदमी को बहुत बड़ी नुकसानी झेलनी पड़ सकती है। एक प्रॉपर्टी बड़ी धनराशि में खरीदी जाती है ऐसी धनराशि जब किसी प्रॉपर्टी खरीदने वाले द्वारा अदा की जाती है तब उसे सभी पुख्ता कानूनी इंतजाम भी करना चाहिए। थोड़ी सी स्टांप ड्यूटी बचाने के लिए खरीदने वाला अपनी एक बहुत बड़ी पूंजी को दांव पर लगा देता है।

पॉवर ऑफ अटॉर्नी सेल डीड नहीं होती है:-

जैसा कि देखा जाता है लोग पॉवर ऑफ अटॉर्नी लिखवा लेते हैं जिस पर बहुत सारे राज्य में स्टांप ड्यूटी नहीं लगती है। ऐसी पावर ऑफ अटॉर्नी से वह लोग सेल का सौदा कर लेते हैं जबकि यह ठीक नहीं है। पॉवर ऑफ अटॉर्नी का इस्तेमाल दूसरी तरह से किया जाता है।

किसी प्रॉपर्टी को खरीदते समय उसकी पॉवर ऑफ अटॉर्नी नहीं लिखवाई जाती है बल्कि सेल डीड बनवाई जाती है और उस सेल डीड का रजिस्ट्रेशन कराना होता है। पॉवर ऑफ अटॉर्नी एक तरह से किसी आदमी को अपनी संपत्ति के सारे अधिकार सौंपना होता है पर फिर भी टाइटल तो उसी व्यक्ति के पास होता है जिस व्यक्ति के नाम पर वह संपत्ति रजिस्टर्ड होती है।

पॉवर ऑफ अटॉर्नी से टाइटल में परिवर्तन नहीं होता है बल्कि पॉवर ऑफ अटॉर्नी तो एक संपत्ति को किसी दूसरे व्यक्ति को बेचने के लिए काम में लाई जा सकती है पर पॉवर ऑफ अटॉर्नी किसी भी सूरत में संपत्ति पर स्वतंत्र स्वामित्व को स्थापित नहीं करती है।

किसी भी संपत्ति को जब खरीदा जाए तब उसे पॉवर ऑफ अटॉर्नी के जरिए नहीं खरीदा जाए क्योंकि ऐसी स्थिति में जब पॉवर ऑफ अटॉर्नी लिखने वाले संपत्ति के स्वामी की मृत्यु हो जाती है तब पॉवर ऑफ अटॉर्नी स्वतः निरस्त हो जाती है और संपत्ति उसके मालिक के वारिसों को नियस्त जाती है।

यह भी देखने में आता है कि ऐसी पॉवर ऑफ अटॉर्नी लिखने वाले साथ में एक वसीयत भी लिख देते हैं क्योंकि वसीयत को भी रजिस्ट्रेशन से छूट है तथा वहां भी स्टांप ड्यूटी बच जाती है। पॉवर ऑफ अटॉर्नी लिखने वाला वसीयत भी उसी व्यक्ति के नाम लिख देता है जिस व्यक्ति के नाम पॉवर ऑफ अटॉर्नी लिखी जाती है।

यह तरीका भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसी वसीयत को संपत्ति के स्वामी के वारिस कभी भी चुनौती दे सकते हैं और जिस दिन ऐसी चुनौती देते हैं तब संपत्ति को खरीदने वाला संपत्ति को खरीद कर भी कानूनी पचड़े में फंस जाता है। इतनी सारी धनराशि अदा करने के बाद भी कानूनी पचड़े को झेलना पड़ता है।

फुल पेमेंट एग्रीमेंट पर भी नहीं होता है स्वामित्व:-

किसी भी प्रॉपर्टी को खरीदने के लिए किए जाने वाले एग्रीमेंट से भी किसी व्यक्ति को स्वामित्व हासिल नहीं होता है क्योंकि ऐसा एग्रीमेंट सिर्फ एक निश्चित समय के लिए किया जाता है। जब किसी संपत्ति का पूरी तरीके से भुगतान हो गया है तब उसे रजिस्ट्रेशन एक्ट में रजिस्ट्रेशन करवाना आवश्यक हो जाता है। एक निश्चित स्टांप ड्यूटी देकर फौरन रजिस्ट्रेशन करवा लेना चाहिए जिससे भविष्य में किसी भी प्रकार की कानूनी दिक्कत नहीं आए।

यह देखने में आता है कि लोग फुल पेमेंट एग्रीमेंट लेकर ही बैठ जाते हैं और संपत्ति पर अपना कब्जा ले लेते हैं। इस बात से समझते हैं कि संपत्ति पर उन्हें स्वामित्व मिल गया जबकि यहां भी कानून ठीक नहीं कहता है। कानून की अपेक्षा है कि जब भी कोई आदमी किसी दूसरे आदमी से किसी भी प्रकार की अचल संपत्ति को खरीदता है तब वह उसका रजिस्ट्रेशन करवाएं और ऐसा रजिस्ट्रेशन केवल रजिस्ट्रेशन एक्ट में होता है।

किसी भी व्यक्ति को सिर्फ रजिस्ट्रेशन के बाद भी स्वामित्व पूरी तरह नहीं मिलता है बल्कि उसका नामांतरण भी करवाना होता है। ऐसा नामांतरण लोकल स्तर पर होता है जो ग्राम पंचायत और नगर निगम करती है।

इस बात पर यह समझना चाहिए कि जब किसी संपत्ति का नामांतरण होने के बाद उस पर किसी व्यक्ति का स्वामित्व समझा जाता है ऐसी स्थिति में मात्र पॉवर ऑफ अटॉर्नी लिखवा लेने और वसीयत लिखवा लेने से या फिर फुल पेमेंट एग्रीमेंट कर देने से किसी भी दूसरे आदमी को स्वामित्व कैसे मिल सकता है।

स्टांप ड्यूटी से बचने के यह सब तरीके ठीक नहीं है क्योंकि इन तरीकों से संपत्ति को खरीदने वाला बहुत बड़ा नुकसान उठा सकता है। संपत्ति बेचने वाला ही मुकदमा ला सकता है या फिर यह हो जाए कि संपत्ति बेचने वाले की मृत्यु हो जाए और उसके बाद उसके वारिस संपत्ति को लेकर न्यायालय में कोई वाद ले आए। उसके वारिस न्यायालय में यह साबित कर सकते हैं कि संपत्ति उसके उत्तराधिकार में हैं और उसका स्वामित्व उस व्यक्ति के पास है जिससे संपत्ति उन्हें उत्तराधिकार में मिली है।

2011 के एक प्रकरण में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से कहा है कि जिन मामलों में स्टांप ड्यूटी बचाने के लिए इस प्रकार से हेरफेर की जाती है और केवल फुल पेमेंट एग्रीमेंट लेकर बैठा जाता है या फिर पॉवर ऑफ अटॉर्नी और वसीयत के जरिए किसी संपत्ति को खरीद लिया जाता है तब कोई भी मामला अगर न्यायालय में लाया गया तो उस पर सुनवाई नहीं की जाएगी और न्यायालय का पक्ष जरा भी उदार नहीं होगा क्योंकि संपत्ति खरीदने वाले व्यक्ति ने सरकार के राजस्व को चोट देने की सोची है तथा वे कपटी है और ऐसे कपटी को किसी भी सूरत में राहत नहीं दी जा सकती।

इसलिए यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि जब कभी हम किसी संपत्ति को खरीदते हैं तब सरकार को उसका संपूर्ण राजस्व अदा करें अन्यथा न्यायालय किसी भी प्रकार से मामले में हस्तक्षेप नहीं करता है और स्पष्ट रूप से यह कहता है कि आपने स्वयं कानून के विरुद्ध कार्य किया है और सरकार के राजस्व को गबन का प्रयास किया है।

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