साइबर ठगी की शिकार महिला को SBI लौटाए ₹3.73 लाख: केरल हाईकोर्ट ने कहा- बैंक महिला की लापरवाही साबित नहीं कर सका
केरल हाईकोर्ट ने साइबर ठगी की शिकार महिला को 3.73 लाख लौटाने का निर्देश भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को दिया। महिला ने धोखाधड़ी का पता चलते ही 24 घंटे के भीतर बैंक और पुलिस को इसकी सूचना दी थी।
जस्टिस हरिशंकर वी. मेनन ने कहा कि बैंक यह साबित नहीं कर सका कि महिला धोखाधड़ी वाले लेनदेन में शामिल थी। समय पर शिकायत किए जाने के कारण वह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमों के तहत शून्य देयता की हकदार है।
याचिकाकर्ता SBI की खाताधारक है और उसके पास बैंक का एटीएम कार्ड भी है। उसे जानकारी मिली थी कि बैंक 29 अप्रैल, 2019 से बिना चिप वाले डेबिट कार्ड ब्लॉक कर देगा। इसके बाद उसे एक SMS मिला, जिसमें बताया गया कि उसका डेबिट कार्ड ब्लॉक कर दिया जाएगा, लेकिन उसे ऑनलाइन दोबारा सक्रिय किया जा सकता है।
इसके कुछ समय बाद महिला को उसी नंबर से फोन आया, जिससे SMS भेजा गया। फोन करने वाले ने बताया कि उसका एटीएम कार्ड ब्लॉक हो गया और इसे दोबारा सक्रिय करने के लिए उसकी भागीदारी जरूरी है। उसे “स्टेट बैंक सिक्योर ऐप” रजिस्टर करने के लिए OTP सहित कुछ जानकारियां देने को कहा गया। महिला ने OTP साझा कर दिया। इसके तुरंत बाद उसके खाते से करीब ₹3.75 लाख निकाल लिए गए।
महिला ने तत्काल SBI की कस्टमर केयर सेवा के जरिए बैंक को इसकी सूचना दी। बैंक ने उसका इंटरनेट बैंकिंग खाता ब्लॉक कर दिया। उसने शाखा प्रबंधक के पास शिकायत दर्ज कराने के साथ पुलिस में भी शिकायत की। पुलिस जांच में सामने आया कि पश्चिम बंगाल के संदीप बाउरी ने खाते से रकम निकाली थी। इसके बावजूद महिला को पैसे वापस नहीं मिले।
इसके बाद महिला ने बैंकिंग लोकपाल के समक्ष शिकायत की, लेकिन वहां यह कहते हुए शिकायत खारिज कर दी गई कि वह कथित धोखाधड़ी वाले लेनदेन में शामिल थी। इस आदेश को चुनौती देते हुए महिला ने केरल हाईकोर्ट का रुख किया।
महिला ने RBI के मास्टर सर्कुलर का हवाला देते हुए दलील दी कि इस मामले में उसकी देयता शून्य है, क्योंकि यह तीसरे पक्ष की धोखाधड़ी थी और इसमें ग्राहक या बैंक की ओर से किसी कमी का प्रमाण नहीं था। सर्कुलर के क्लॉज 6(ii) के अनुसार, यदि ग्राहक अनधिकृत लेनदेन के संबंध में बैंक से सूचना मिलने के तीन कार्यदिवसों के भीतर बैंक को सूचित कर देता है तो उसकी देयता शून्य हो सकती है और बैंक को रकम वापस करनी होती है।
महिला ने यह भी कहा कि “स्टेट बैंक सिक्योर ऐप” के बारे में व्यापक प्रचार नहीं किया गया। उसे लगा कि OTP साझा करने के बाद भी ऐप के जरिए पैसे निकालने के लिए अतिरिक्त OTP की जरूरत होगी। हालांकि, ठग ने उसके दिए OTP का इस्तेमाल ऐप में रजिस्ट्रेशन करने और खाते से रकम निकालने के लिए किया।
दूसरी ओर, बैंक ने दलील दी कि मामला RBI सर्कुलर के क्लॉज 7(i) के तहत आता है, जो ग्राहक की लापरवाही से भुगतान संबंधी गोपनीय जानकारियां साझा किए जाने से हुए नुकसान से जुड़ा है। बैंक के अनुसार, ऐसी स्थिति में अनधिकृत लेनदेन की सूचना दिए जाने तक का पूरा नुकसान ग्राहक को उठाना होता है, जबकि बैंक की जिम्मेदारी शिकायत के बाद होने वाले नुकसान तक सीमित रहती है।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने गुवाहाटी हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के 2024 के एक फैसले का उल्लेख किया। उस मामले में भी साइबर धोखाधड़ी की इसी तरह की घटना के बाद बैंक को ग्राहक की रकम लौटाने का निर्देश दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका (SLP) भी खारिज कर दी थी।
केरल हाईकोर्ट ने कहा कि ऐप और रकम निकाले जाने के तरीके के संबंध में महिला की दलीलों का बैंक ने खंडन नहीं किया। इसलिए उन्हें अविश्वसनीय मानने का कोई आधार नहीं है। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि महिला ने उसी दिन शिकायत दर्ज करा दी थी, लेकिन बैंक ने खाते से निकाली गई रकम वापस जमा कराने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। पुलिस द्वारा ठग की पहचान किए जाने के बाद भी बैंक ने आगे कोई कार्रवाई नहीं की।
कोर्ट ने कहा कि पुलिस की रिपोर्ट से भी स्पष्ट है कि महिला धोखाधड़ी में शामिल नहीं थी। ऐसे में उसका मामला RBI के मास्टर सर्कुलर के क्लॉज 6(ii) के तहत आता है और गुवाहाटी हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले के अनुरूप है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रहने दिया।
हाईकोर्ट ने बैंकिंग लोकपाल का आदेश रद्द करते हुए SBI को महिला को हुए ₹3.73 लाख के नुकसान की भरपाई करने का निर्देश दिया। बैंक को चार सप्ताह के भीतर यह रकम लौटानी होगी।