समलैंगिक जोड़े ने कर्नाटक हाईकोर्ट में दलील दी कि आयकर अधिनियम, 1961 (Income Tax Act) के तहत विवाहित जोड़ों को मिलने वाली गिफ्ट टैक्स छूट से समलैंगिक साथियों को बाहर रखने को संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत 'बुद्धिगम्य अंतर' के सिद्धांत से उचित नहीं ठहराया जा सकता। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह बहिष्कार लिंग के आधार पर होता है, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 15 में दिए गए भेदभाव-विरोधी संरक्षण का भी उल्लंघन करता है।

जस्टिस बी.एम. श्याम प्रसाद के समक्ष सुनवाई के दौरान यह दलील दी गई। याचिका में समलैंगिक साथियों को एक-दूसरे से मिले गिफ्ट टैक्स छूट का दावा करने के लिए कानून में 'पति या पत्नी' की परिभाषा से बाहर रखने को चुनौती दी गई।

याचिकाकर्ताओं ने आयकर अधिनियम की धारा 56(2)(x) के पांचवें परंतुक के तहत मिलने वाली छूट से वंचित किए जाने पर सवाल उठाया। इस प्रावधान के तहत पति या पत्नी सहित कुछ निर्दिष्ट रिश्तेदारों से मिले उपहारों को आय मानकर उन पर कर नहीं लगाया जाता।

मामला तब सामने आया, जब एक समलैंगिक साथी द्वारा दूसरे को कथित तौर पर उपहार में दिए गए 22 कैरेट सोने के कंगन पर कर लगा दिया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इसी परिस्थिति में किसी विषमलैंगिक विवाहित जोड़े को यह छूट मिल जाती।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील डॉ. ध्रुव जैनसेन-सांघवी ने कहा कि केंद्र सरकार का यह तर्क गलत है कि कानून में कुछ समूहों को शामिल न करना अपने आप में भेदभाव नहीं है। उनके अनुसार, 'बुद्धिगम्य अंतर' की कसौटी अनुच्छेद 14 से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 15 में निषिद्ध आधार यानी लिंग के आधार पर अंतर करने की अनुमति नहीं है।

उन्होंने कहा कि इस मामले का सही संवैधानिक विश्लेषण अनुच्छेद 14 के तहत वर्गीकरण की पर्याप्तता तक सीमित नहीं है, बल्कि अनुच्छेद 15 के साथ अनुच्छेद 14 को पढ़ते हुए अप्रत्यक्ष भेदभाव के सिद्धांत के आधार पर किया जाना चाहिए।

इससे पहले केंद्र सरकार ने सुप्रियो (2023) मामले पर भरोसा करते हुए दलील दी कि किसी वर्ग को कानून के दायरे से बाहर रखना अपने आप में भेदभावपूर्ण नहीं है। केंद्र ने स्टेट ऑफ गुजरात बनाम श्री अंबिका मिल्स लिमिटेड, एन. वेंगोपाला रवि वर्मा राजा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और इनकम टैक्स ऑफिसर, शिलांग बनाम एन. ताकिम रॉय रिम्बाई मामलों का भी हवाला दिया था।

सांघवी ने कहा कि केंद्र द्वारा उद्धृत तीनों फैसले अनुच्छेद 14 के तहत दिए गए, जिनमें अदालत ने बुद्धिगम्य अंतर और तर्कसंगत संबंध की कसौटी लागू की। लेकिन मौजूदा मामले में अनुच्छेद 15 लागू होता है, क्योंकि समलैंगिक जोड़ों को बाहर रखने का आधार लिंग है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 15(1) में प्रयुक्त 'जेंडर' के दायरे में यौन अभिविन्यास भी शामिल है।

याचिकाकर्ताओं ने अपने जवाब में कहा,

“यह मामला पूरी तरह जेंडर के आधार पर होने वाले अप्रत्यक्ष भेदभाव से जुड़ा है।”

उन्होंने यह भी दलील दी कि कानून के दायरे में किसी वर्ग को शामिल न करने को उचित ठहराने का सिद्धांत इस मामले में अप्रासंगिक है।

उनका कहना था कि एक बार अनुच्छेद 15 लागू हो जाने पर निषिद्ध आधार यानी जेंडर के आधार पर कोई बुद्धिगम्य अंतर नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसे अनुच्छेद 15(3) के तहत संरक्षण प्राप्त न हो।

याचिकाकर्ताओं ने बताया कि सुप्रियो मामले में विवाह की संस्था तक पहुंच से इनकार को अनुच्छेद 15(3) के संदर्भ में स्वीकार किया गया। यह प्रावधान महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष व्यवस्था करने की अनुमति देता है। उनके अनुसार, घरेलू हिंसा, भरण-पोषण, गुजारा भत्ता और दहेज निषेध से जुड़े कानून इसी तरह के संरक्षण के संदर्भ में आते हैं। लेकिन मौजूदा मामले में ऐसा कोई अपवाद लागू नहीं होता, क्योंकि विवाद कर कानून के तहत मिलने वाले आर्थिक लाभ से संबंधित है।

याचिकाकर्ताओं ने आगे कहा कि संवैधानिक विश्लेषण की शुरुआत अनुच्छेद 15 से होनी चाहिए। यदि यह स्थापित हो जाता है कि अनुच्छेद 15 याचिकाकर्ताओं और समान परिस्थितियों वाले विषमलैंगिक जोड़े के बीच भेदभाव को प्रतिबंधित करता है, तो अनुच्छेद 14 के तहत समान संरक्षण का अधिकार भी लागू होगा। उनके अनुसार, निषिद्ध आधार पर भेदभाव सामने आने के बाद अनुच्छेद 14 की बुद्धिगम्य अंतर वाली कसौटी को अनुच्छेद 15 में शामिल नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ताओं ने सुप्रियो फैसले के भाग छह का भी हवाला दिया, जिसे जस्टिस भट ने लिखा था और जिसमें अप्रत्यक्ष भेदभाव को असंवैधानिक माना गया। उन्होंने लेफ्टिनेंट कर्नल नितिशा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2021) मामले का भी उल्लेख किया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दो चरणों वाली कसौटी निर्धारित की थी: पहले यह देखना कि चुनौती दिया गया नियम किसी विशेष समूह को असमान रूप से प्रभावित करता है या नहीं, और फिर यह जांचना कि क्या कानून का प्रभाव उस समूह के नुकसान को मजबूत करने, बनाए रखने या बढ़ाने वाला है, जिसमें आर्थिक बहिष्कार भी शामिल है।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि सुप्रियो फैसले के बाद समलैंगिक समुदाय के वित्तीय और प्रशासनिक हितों की रक्षा के लिए गठित कैबिनेट सचिव की समिति इस मामले में उचित मंच नहीं है। उनके अनुसार, यह समिति वित्त वर्ष 2024-25 में हो चुकी घटनाओं के लिए कानून में संशोधन नहीं कर सकती, जबकि संबंधित कर निर्धारण वर्ष 2025-26 है। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत राहत देने का अधिकार केवल हाईकोर्ट के पास है।

इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं ने अदालत से अनुरोध किया कि विवादित प्रावधान के तहत मिलने वाले समान संरक्षण और कर छूट का लाभ उन्हें भी दिया जाए।

दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।

मामले का केंद्र आयकर अधिनियम की धारा 56(2)(x) है, जिसके तहत पति या पत्नी सहित निर्दिष्ट रिश्तेदारों से मिले उपहारों को आय नहीं माना जाता। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कानून में उन्हें 'पति या पत्नी' की परिभाषा में शामिल नहीं किए जाने के कारण एक साथी को दूसरे से मिला सोने का कंगन कर योग्य माना गया, जबकि समान परिस्थितियों में विषमलैंगिक विवाहित जोड़े को कर नहीं देना पड़ता।

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से घोषणा करने की मांग की है कि इस प्रावधान के तहत मिलने वाली छूट उन्हें भी समान रूप से उपलब्ध हो। वैकल्पिक रूप से, उन्होंने अनुरोध किया है कि केवल इस प्रावधान के उद्देश्य से 'पति या पत्नी' शब्द की व्याख्या में उन्हें भी शामिल किया जाए।

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