कर्नाटक हाईकोर्ट ने मदरसा के संस्थापक ट्रस्टी के खिलाफ दर्ज मामला रद्द करने से इनकार कर दिया, जिसने एक नाबालिग लड़के के साथ दो मदरसा शिक्षकों द्वारा किए गए अप्राकृतिक यौन उत्पीड़न की कथित घटना के बारे में पुलिस को रिपोर्ट नहीं की थी।

अदालत ने कहा कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप इतने भयानक थे कि याचिकाकर्ता को तुरंत इसकी सूचना देनी चाहिए थी, जब यह उसके संज्ञान में आया। साथ ही उन्होंने कहा कि वह कथित अपराध की रिपोर्ट करने में विफल रहा।

जस्टिस एम नागप्रसन्ना ने मोहम्मद आमिर रजा द्वारा दायर याचिका खारिज की, जो माणिक मस्तान मदरसा के ट्रस्टी हैं। उन पर यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम 2012 की धारा 17 और 21 और भारतीय दंड संहिता की धारा 34 के साथ धारा 506 के तहत दंडनीय अपराधों का आरोप लगाया गया।

इसमें कहा गया,

“यदि पीड़ित के बयान पर ध्यान दिया जाए तो यह स्पष्ट रूप से इंगित करेगा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ दोनों अपराध किए जा रहे हैं। वह विफलता निस्संदेह अधिनियम की धारा 21 के तहत सजा को आकर्षित करेगी यद्यपि प्रथम दृष्टया निस्संदेह अपराध की रिपोर्ट करने में विफल रहा है।”

इसके अलावा उन्होंने कहा,

“आरोपी नंबर 1 और 2 के खिलाफ लगाए गए अपराध इतने भयानक और जघन्य हैं कि याचिकाकर्ता को इसकी जानकारी मिलते ही इसकी रिपोर्ट कर देनी चाहिए। वह जानता था या नहीं, इसका फैसला CrPC की धारा 482 के तहत याचिका में नहीं किया जा सकता।”

यह साक्ष्य का मामला है, क्योंकि CrPC की धारा 164 के तहत पीड़ित का बयान याचिकाकर्ता के बचाव के बिल्कुल विपरीत है। अभियोजन पक्ष के अनुसार शिकायतकर्ता का बेटा लगभग 11 वर्षीय नाबालिग लड़का मदरसे में पढ़ रहा था।

जून 2023 से 29 सितंबर 2023 के बीच शिकायत दर्ज होने से चार महीने पहले मदरसे के शिक्षकों ने कथित तौर पर अप्राकृतिक यौन उत्पीड़न किया।

जब लड़के ने मदरसे में वापस जाने का विरोध किया तो शिकायतकर्ता ने पूछताछ करने पर हमले के बारे में पता लगाया। इसके बाद उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि आरोपी नंबर 1 और 2, जो मदरसे में शिक्षक हैं, द्वारा किए गए कृत्य निस्संदेह अक्षम्य हैं। हालांकि उन्हें नहीं पता था कि क्या हुआ था और जब उन्हें पता चला तो उन्होंने अपराध दर्ज करने के लिए लड़ाई भी लड़ी। इसलिए उसके खिलाफ कोई कार्यवाही जारी रखने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

अभियोजन पक्ष ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को मदरसे में क्या हो रहा था या क्या हुआ था, इसकी पूरी जानकारी थी। इसके बावजूद उसने पुलिस को सूचना नहीं दी। सूचना न देने के कारण पीड़ित को आरोपी नंबर 1 और 2 यानी शिक्षकों द्वारा बार-बार परेशान किया जा रहा है।

निष्कर्ष

अदालत ने शिकायत और पुलिस द्वारा दायर आरोपपत्र का अध्ययन किया और संबंधित प्रावधानों का हवाला दिया।

इसके बाद उन्होंने कहा,

"यह सार्वजनिक रूप से ज्ञात है कि अधिनियम के तहत किए गए जघन्य अपराधों के कई मामले सूचना के अभाव के कारण अनदेखे रह जाते हैं, क्योंकि संबंधित व्यक्ति इसे दबा देते हैं। लेकिन तथ्य यह है कि पीड़ित जो आरोपियों द्वारा इस तरह के हमले के शिकार होते हैं। उचित मामलों को छोड़कर रिपोर्ट न करने के कारण बच निकलते हैं। इसलिए रिपोर्ट न करना गंभीर अपराध बन जाता है।"

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस बनाम एस. हरीश के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए, जिसमें न्यायालय ने अधिनियम के तहत अपराधों की गैर-रिपोर्टिंग के मामलों पर विचार किया और अधिनियम की धारा 19 का सख्ती से अनुपालन करने का निर्देश दिया।

पीठ ने कहा,

“अधिनियम के तहत अपराधों की रिपोर्टिंग के लिए सख्त अनुपालन की आवश्यकता होती है, जिसके न होने पर किसी बच्चे पर बलात्कार या यौन शोषण से उत्पन्न अपराध करने वाला अपराधी कानून के शिकंजे से बच जाएगा, जो अधिनियम के प्रख्यापन के मूल उद्देश्य को विफल कर देगा, क्योंकि यह प्रावधान बाल शोषण की रोकथाम के उपायों की दिशा में उठाए गए कदमों में से एक है। इसलिए रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी सभी हितधारकों पर है।”

इसके बाद उन्होंने कहा,

“यदि मामले में तथ्यों पर ध्यान दिया जाए तो गैर-रिपोर्टिंग एक गंभीर अपराध बन जाता है, क्योंकि मुख्य अपराधियों-शिक्षकों के खिलाफ अपराध इतने भयानक हैं कि इसकी पुनरावृत्ति समाज की मानसिकता पर भयावह प्रभाव डालेगी।”

तदनुसार इसने याचिका को खारिज कर दिया।

केस टाइटल: मोहम्मद आमिर रजा और कर्नाटक राज्य और अन्य

Tags: