हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ केवल विरोध करना या अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 186 के तहत अपराध नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसा कोई प्रत्यक्ष कृत्य नहीं हुआ जिससे सरकारी कर्मचारी अपने आधिकारिक कर्तव्य का निर्वहन करने से वास्तव में बाधित हुआ हो तो इसे सरकारी काम में स्वेच्छा से बाधा डालना नहीं माना जा सकता।

जस्टिस संदीप शर्मा ने कहा कि सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा जरूरी नहीं कि केवल शारीरिक हो लेकिन अभियोजन को ऐसा कृत्य साबित करना होगा, जिसमें बल धमकी या ऐसा प्रभाव हो जिससे सरकारी कर्मचारी अपने कर्तव्य का पालन करने से वास्तव में रुक गया हो।

अदालत ने स्पष्ट किया,

“केवल विरोध करना या अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना, बिना किसी प्रत्यक्ष कृत्य के, भारतीय दंड संहिता की धारा 186 के तहत दंडनीय अपराध नहीं है।”

मामला पुलिस की ओर से दर्ज कलंदरा से जुड़ा था जिसे रद्द कराने के लिए याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का रुख किया। उनके खिलाफ IPC की धारा 186 और 189 के तहत कार्रवाई की गई।

मामले के अनुसार पुलिस ने नाके के दौरान याचिकाकर्ताओं का वाहन रोका था। वाहन में एलईडी लाइट लगाए जाने सहित मोटर वाहन कानून के कथित उल्लंघनों को लेकर पुलिस ने चालान जारी किया।

पुलिस का आरोप था कि याचिकाकर्ताओं ने अधिकारियों के खिलाफ आरोप लगाए और उनके सरकारी काम में बाधा डाली।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर गौर किया तो पाया कि पुलिस के इशारे पर याचिकाकर्ताओं ने अपना वाहन रोक दिया था और आवश्यक दस्तावेज भी प्रस्तुत किए। पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कथित टिप्पणियों के बावजूद पुलिस अपना काम करने में सक्षम रही और उसने चालान भी जारी किया।

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ताओं ने पुलिस अधिकारी को उसके सरकारी कार्य के निर्वहन से वास्तव में रोका या उसे अपना काम करने से हतोत्साहित किया।

पीठ ने कहा कि धारा 186 के तहत अपराध के लिए सरकारी कर्मचारी के सार्वजनिक कार्य के निर्वहन में स्वेच्छा से बाधा डालना जरूरी है।

स्वेच्छा से शब्द से यह स्पष्ट होता है कि किसी प्रत्यक्ष कृत्य का होना आवश्यक है। केवल निष्क्रिय व्यवहार जिससे सरकारी कर्मचारी अपने काम से बाधित न हो, इस धारा के तहत अपराध नहीं बनता।

अदालत ने यह भी कहा कि सरकारी काम में बाधा शारीरिक होना अनिवार्य नहीं है लेकिन ऐसा कृत्य जरूर होना चाहिए, जिसमें बल या धमकी शामिल हो या जिसका वास्तविक प्रभाव सरकारी कर्मचारी को अपना कर्तव्य निभाने से रोकने के रूप में सामने आए।

मामले में धारा 186 के अपराध के आवश्यक तत्व नहीं पाए जाने और दोषसिद्धि की संभावना बेहद कम होने के कारण हाईकोर्ट ने कहा कि कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

इसके बाद हाईकोर्ट ने कलंदरा और उसके आधार पर जुड़ी आगे की कार्यवाही को रद्द कर दिया तथा न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, जुब्बल के समक्ष लंबित मामले में आरोपियों को आरोपों से बरी किया।

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