सबूतों की कड़ी अधूरी, केवल संदेह पर नहीं हो सकती सजा: गुजरात हाईकोर्ट ने मर्डर केस में फांसी की सजा रद्द की
गुजरात हाईकोर्ट ने एक दोहरे हत्या मामले में सुनाई गई फांसी की सजा रद्द करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ठोस और निर्णायक सबूत पेश करने में पूरी तरह विफल रहा। अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला “संदेह, अनुमान और कल्पना” पर आधारित था, जो कानून के सिद्धांतों के विपरीत है।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर. टी. वच्छानी की खंडपीठ ने पाया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला स्थापित नहीं की जा सकी। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को “संदेह से परे” साबित नहीं कर पाया।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि आपराधिक न्यायशास्त्र का मूल सिद्धांत है कि आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक उसका अपराध पुख्ता सबूतों के आधार पर साबित न हो जाए। केवल मजबूत परिस्थितियां भी प्रमाण का स्थान नहीं ले सकतीं।
यह मामला अहमदाबाद में महिला के पति और सास की हत्या से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार आरोपी का महिला के साथ संबंध था और इसी वजह से उसने दोनों की हत्या की।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि कथित “लास्ट सीन” गवाह ने अभियोजन का साथ नहीं दिया और उसे शत्रुतापूर्ण घोषित करना पड़ा। इसके अलावा, कथित कबूलनामा भी साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया गया क्योंकि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 26 के तहत पुलिस के समक्ष दिया गया बयान मान्य नहीं होता।
अदालत ने यह भी कहा कि घटनास्थल पुनर्निर्माण से कोई ऐसा ठोस सबूत सामने नहीं आया, जो आरोपी को अपराध से सीधे जोड़ सके। साथ ही, सीसीटीवी फुटेज को भी साक्ष्य के रूप में खारिज कर दिया गया, क्योंकि वह भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र के बिना प्रस्तुत किया गया।
मोटिव के संबंध में भी अदालत ने पाया कि मृतकों के परिजनों या पड़ोसियों ने आरोपी और महिला के बीच किसी संबंध की पुष्टि नहीं की। इस कारण हत्या के पीछे बताए गए कारण को भी साबित नहीं किया जा सका।
अदालत ने कहा,
“परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के मामलों में केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती, चाहे परिस्थितियां कितनी भी मजबूत क्यों न हों।”
इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ दोषसिद्धि और फांसी की सजा दोनों को रद्द किया और अपील मंजूर की।