दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रदर्शन और भीड़ नियंत्रण ड्यूटी में तैनात पुलिसकर्मियों के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरा अनिवार्य और लगातार चालू रखने संबंधी मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने की मांग वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को छह महीने के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने याचिका को केंद्र के समक्ष प्रतिनिधित्व के रूप में लेने और इस पर निर्णय याचिकाकर्ता को बताने को कहा।

चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव सांब्रे की कार्यवाहक अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच और जस्टिस अरुण भारद्वाज ने यह निर्देश जारी किया। याचिका एडवोकेट चाहत राघव ने दायर की। इसमें पुलिस द्वारा भीड़ नियंत्रण और प्रदर्शन प्रबंधन के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले बॉडी-वॉर्न कैमरों की रिकॉर्डिंग को सेव करने, उसकी विश्वसनीयता, रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की अवधि और अदालत में साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल के लिए व्यापक व्यवस्था बनाने की मांग की गई।

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट अखिल सिब्बल ने कहा कि पुलिस बॉडी-वॉर्न कैमरों का इस्तेमाल करती है, लेकिन यह व्यवस्थित और एक समान प्रक्रिया के तहत नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के दौरान अक्सर पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग करने के आरोप लगते हैं, वहीं प्रदर्शनकारियों पर पथराव या हिंसा के आरोप भी सामने आते हैं। ऐसी स्थिति में घटनाओं की रिकॉर्डिंग के लिए किसी तय व्यवस्था का होना जरूरी है, ताकि जवाबदेही केवल राहगीरों या निजी लोगों द्वारा बनाए गए वीडियो पर निर्भर न रहे।

सिब्बल ने कहा कि इस संबंध में वर्ष 2022 का एक स्थायी आदेश भी मौजूद है। उन्होंने दलील दी कि जब हिंसा की घटनाओं में पुलिस और प्रदर्शनकारियों की ओर से एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाते हैं, तब यह तय करने के लिए प्रमाण जरूरी होते हैं कि हिंसा किसने की और क्या पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल किया। उनके अनुसार, बॉडी कैमरा जवाबदेही तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

कोर्ट ने पूछा कि क्या याचिका में किसी ऐसी घटना का उल्लेख किया गया है, जिसमें पुलिस ने बॉडी-वॉर्न कैमरों का दुरुपयोग किया हो। इस पर सिब्बल ने कहा कि याचिका किसी खास घटना की जांच की मांग नहीं कर रही है बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया तय करने की मांग कर रही है, जिसका पालन सभी मामलों में किया जा सके।

उन्होंने यह भी कहा कि आपराधिक कानूनों, विशेष रूप से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में बॉडी-वॉर्न कैमरों के इस्तेमाल को लेकर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। उनका कहना था कि यह मुद्दा समय-समय पर सामने आता रहा है, लेकिन इसके लिए कोई स्पष्ट एसओपी नहीं है।

सिब्बल ने कहा कि यदि तकनीक उपलब्ध है तो उसका इस्तेमाल जवाबदेही तय करने में किया जा सकता है। उन्होंने बॉडी-वॉर्न कैमरों की तुलना चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक से अलग बताते हुए कहा कि बॉडी कैमरा अधिकारी की पूरी गतिविधि और घटनाक्रम रिकॉर्ड कर सकता है। उनके अनुसार, रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखकर उसकी पूरी श्रृंखला और प्रामाणिकता को नियंत्रित किया जा सकता है।

केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के बलवंत सिंह मामले के फैसले और दिल्ली हाईकोर्ट के उन नियमों का हवाला दिया, जिनके तहत जनहित याचिका के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने से पहले संबंधित प्राधिकरण के समक्ष प्रतिनिधित्व करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन आयोजित करने को लेकर पहले से दिशानिर्देश मौजूद हैं और उनमें वीडियोग्राफी का पहलू भी शामिल है। उन्होंने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता बॉडी-वॉर्न कैमरों के इस्तेमाल के लिए एसओपी बनाने की मांग को लेकर केंद्र को प्रतिनिधित्व दे सकती हैं और सरकार उस पर कानून के अनुसार फैसला कर सकती है।

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के इस बयान के बाद कोर्ट ने कहा कि पुलिस द्वारा बॉडी-वॉर्न कैमरों के इस्तेमाल का संकेत जारी की गई निविदा और ट्रैफिक पुलिस द्वारा इनके इस्तेमाल से भी मिलता है। हालांकि, कोर्ट के समक्ष यह बताया गया कि इनके इस्तेमाल को लेकर कोई स्पष्ट एसओपी मौजूद नहीं है। कोर्ट ने कहा कि चूंकि केंद्र की ओर से इस संबंध में निर्णय लेने का आश्वासन दिया गया है, इसलिए उसे रिकॉर्ड पर लिया जाना उचित है।

कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया कि वह बॉडी-वॉर्न कैमरों के इस्तेमाल संबंधी एसओपी तैयार करने के मुद्दे पर छह महीने के भीतर निर्णय ले और इसकी जानकारी याचिकाकर्ता को दे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता सरकार की निष्क्रियता या निर्णय से असंतुष्ट होती हैं, तो उन्हें दोबारा हाईकोर्ट का रुख करने की स्वतंत्रता होगी।

याचिका जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में दायर की गई। याचिकाकर्ता के अनुसार, इन प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगाए गए, जबकि प्रदर्शनकारियों पर पथराव, तोड़फोड़ और पुलिसकर्मियों पर हमले के आरोप भी सामने आए।

याचिका में कहा गया कि घटनाओं को रिकॉर्ड करने वाली अधिकांश सामग्री राहगीरों के मोबाइल फोन से सामने आई, जबकि पुलिस की ओर से प्रमाणिक और आधिकारिक रिकॉर्डिंग की कोई व्यवस्थित व्यवस्था नहीं थी। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इससे पुलिस की कथित ज्यादती और हिंसक प्रदर्शनकारियों के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्य, दोनों ही संयोग से बनाए गए निजी वीडियो पर निर्भर हो जाते हैं।

याचिका में बॉडी-वॉर्न कैमरों से तैयार रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल की मांग की गई। इसमें रिकॉर्डिंग की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए हैश वैल्यू, सुरक्षित सर्वर पर अपलोड की व्यवस्था, कैमरा पहनने वाले अधिकारी द्वारा रिकॉर्डिंग में बदलाव की संभावना को रोकने के उपाय, ऑडिट योग्य अभिरक्षा श्रृंखला और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63 के तहत प्रमाणन जैसे सुरक्षा उपाय शामिल करने की मांग की गई।

हाईकोर्ट ने फिलहाल याचिका पर सीधे कोई आदेश जारी करने के बजाय केंद्र को इसे प्रतिनिधित्व के रूप में लेने और छह महीने के भीतर निर्णय करने का निर्देश दिया।

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