दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि 'पर्सनैलिटी राइट्स' (व्यक्तित्व अधिकार) कोई एक 'कॉज़ ऑफ़ एक्शन' नहीं हैं। इसके अलावा, किसी व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल करना मात्र ही गैर-कानूनी नहीं है।

जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने यह टिप्पणी तब की, जब उन्होंने एक्ट्रेस कृति सेनन को उनके नाम, तस्वीर, हुलिए और आवाज़ के कथित दुरुपयोग (AI-जनरेटेड डीपफेक, किसी और का रूप धरने, या सिंथेटिक वॉयस मॉडल के ज़रिए) के खिलाफ अंतरिम सुरक्षा प्रदान की।

कोर्ट ने कहा कि 'पब्लिसिटी राइट' (प्रचार का अधिकार) किसी व्यक्ति की पहचान के व्यावसायिक मूल्य की रक्षा करता है। इसे लाइसेंस पर दिया जा सकता है, जबकि निजता, गरिमा और प्रतिष्ठा व्यक्तिगत हित हैं जिन्हें किसी और को नहीं सौंपा जा सकता।

कोर्ट ने कहा,

"ये अधिकार हर व्यक्ति को प्राप्त हैं। किसी पहचान का व्यावसायिक मूल्य है या नहीं, और उसके दुरुपयोग से कितना नुकसान हुआ है, इसमें 'प्रसिद्धि' (Fame) एक कारक हो सकती है; लेकिन यह इन अधिकारों के मिलने की कोई शर्त नहीं है। इसी तरह किसी व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल करना मात्र ही अपने आप में गैर-कानूनी नहीं है।"

कोर्ट ने आगे कहा कि जो वादी (Plaintiff) अपने 'पर्सनैलिटी राइट्स' की सुरक्षा चाहता है, उसे प्रतिवादी (Defendant) के हिसाब से और कंटेंट के हिसाब से यह स्पष्ट करना होगा कि वह क्या दावा कर रहा है और उसके समर्थन में क्या सामग्री है। कोर्ट ने कहा कि सभी दावों को एक साथ मिलाकर एक ही 'ब्लैंकेट इंजंक्शन' (व्यापक रोक आदेश) की मांग नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने कहा कि 'पर्सनैलिटी राइट्स' से जुड़े कानूनी सवालों पर संबंधित प्रतिवादियों का पक्ष सुनने के बाद उनके गुण-दोष के आधार पर फैसला लिया जाएगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल एक अंतरिम व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य पक्षों के अधिकारों को सुरक्षित रखना है।

'पर्सनैलिटी राइट्स' कोई एक 'कॉज़ ऑफ़ एक्शन' नहीं है। यह कई अलग-अलग तरह के दावों का एक समूह है, जो तब पैदा हो सकते हैं, जब किसी व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल उसकी सहमति के बिना किया जाता है।

अदालत ने कहा,

"इसमें पब्लिसिटी का अधिकार, पासिंग ऑफ, निजता का अधिकार, मानहानि, और जहां शर्तें पूरी होती हैं, वहां ट्रेडमार्क अधिनियम, 1999 और कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के तहत मिलने वाले अधिकार (जिसमें कलाकारों के अधिकार भी शामिल हैं) आते हैं।"

अदालत ने आगे कहा कि हर दावे के अपने अलग तत्व, बचाव और उपाय होते हैं। इसलिए इन सबको एक ही श्रेणी में रखने से किसी एक दावे पर लागू होने वाली कानूनी शर्तें या मानक कम नहीं हो जाते।

अदालत ने कहा,

"चाहे वह मानहानिपूर्ण बयानों को मुकदमे से पहले रोकने के लिए तय किए गए कड़े मानक हों, या फिर पब्लिसिटी के अधिकार पर 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' की सीमाएं हों।"

सानन ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और आरोप लगाया कि कई लोग और संस्थाएं उनके नाम, तस्वीर, शक्ल और आवाज का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं।

इस गलत इस्तेमाल में उनके नाम पर कार्यक्रमों की बुकिंग करना, सोशल मीडिया अकाउंट्स के जरिए उनका रूप धरकर लोगों को धोखा देना, AI से बनी या मॉर्फ की गई तस्वीरें फैलाना, सामान बेचना, AI चैटबॉट और उनकी आवाज वाले मॉडल बनाना (जो ऐसे पेश किए जाते हैं जैसे कि वे खुद अभिनेत्री हों) और अश्लील 'डीपफेक' सामग्री होस्ट करना शामिल है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस रोक (इंजंक्शन) का असर समाचार, समीक्षा, आलोचना, टिप्पणी, व्यंग्य, पैरोडी, कैरिकेचर या प्रशंसकों की उन अभिव्यक्तियों पर नहीं पड़ेगा, जो अदालत के इन निर्देशों के दायरे में नहीं आती हैं।

बता दें, एक अन्य बेंच 'पर्सनैलिटी राइट्स' (व्यक्तित्व अधिकारों) से जुड़े बड़े मुद्दे पर सुनवाई कर रही है। यह मामला अभिनेताओं जान्हवी कपूर, विवेक ओबेरॉय और आराध्या बच्चन द्वारा दायर उन मुकदमों से जुड़ा है, जिनमें उन्होंने अपने 'पर्सनैलिटी राइट्स' की सुरक्षा की मांग की।

इन मामलों में वकील गौतम भाटिया और रोहन अल्वा को 'एमीक्स क्यूरी' (अदालत के सहयोगी) के रूप में नियुक्त किया गया।

भाटिया ने अपनी दलीलों में कहा कि भारतीय कानून में केवल 'पर्सनैलिटी राइट्स' के आधार पर कोई दावा करना और उसके साथ 'जॉन डो' (अज्ञात व्यक्तियों) के खिलाफ व्यापक रोक (इंजंक्शन) मांगना, एक ऐसी प्रक्रिया है जो भारतीय कानून में पहले कभी नहीं देखी गई।

भाटिया ने तर्क दिया कि 'पर्सनैलिटी राइट्स' कोई ऐसा कानूनी आधार (कॉज ऑफ एक्शन) नहीं है, जिसके लिए 'डायनामिक इंजंक्शन' जैसा कोई एक समान उपाय दिया जा सके। बल्कि, इस शब्द के दायरे में कई अलग-अलग कानूनी अधिकार आते हैं, जिनकी सुरक्षा अलग-अलग कानूनी आधारों और उपायों के जरिए की जा सकती है।

Case Title : KRITI SANON v. BBE MARKETING INC & ORS

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