'मामला एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा': दिल्ली हाईकोर्ट ने ओपन जेल सुधारों को लेकर DG (जेल) को अवमानना नोटिस जारी किया
दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार (28 अक्टूबर) को दिल्ली के महानिदेशक (जेल) को अवमानना नोटिस जारी किया। उन पर आरोप है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ओपन जेल सुधारों से जुड़े निर्देशों का पालन करने के बारे में खुद शपथ-पत्र (Affidavit) दाखिल नहीं किया, बल्कि अपने किसी अधीनस्थ (Subordinate) से ऐसा शपथ-पत्र दाखिल करवाया, जिसमें अधूरी जानकारी थी।
एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव साम्ब्रे और जस्टिस संजय शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि DG (जेल) ने हाईकोर्ट के आदेशों की "पूरी तरह से अनदेखी" की। उन्हें इस मामले को देखने के लिए विशेष निर्देश दिए गए, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपने खुद के हस्ताक्षर वाला शपथ-पत्र दाखिल नहीं किया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को लागू करने का काम रुक गया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि "शायद सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद, उनके निर्देशों के पालन की रिपोर्ट देने के मामले में कोई प्रगति नहीं हुई - यह एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा है।"
कोर्ट ने निर्देश दिया कि एक सप्ताह के भीतर DG (जेल) को अवमानना नोटिस तामील कराया जाए और उनसे सुनवाई की अगली तारीख तक अपना जवाब दाखिल करने को कहा।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट के 26 फरवरी, 2026 के उन निर्देशों से जुड़ा है, जिनमें देश भर में 'ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशंस' (OCIs) यानी ओपन जेलों के प्रभावी उपयोग और विस्तार की बात कही गई। सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा था कि ओपन जेलों को सुधार और पुनर्वास (Rehabilitation) के सार्थक केंद्रों के रूप में काम करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे 'स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी' के कार्यकारी अध्यक्ष की अध्यक्षता में निगरानी समितियां (Monitoring Committees) बनाएं, जो इन निर्देशों के लागू होने की निगरानी कर सकें। '1382 जेलों में अमानवीय स्थितियां' (In Re: Inhuman Conditions in 1382 Prisons) मामले में पहले दिए गए निर्देशों के बाद भी कोई सार्थक प्रगति न होने को देखते हुए हाई कोर्टों को निर्देश दिया गया था कि वे 'सुओ मोटो' (स्वयं संज्ञान लेते हुए) रिट याचिकाएं दर्ज करें, ताकि निर्देशों के पालन की लगातार निगरानी की जा सके।
हाईकोर्ट ने ध्यान दिलाया कि 13 अक्टूबर के आदेश के तहत तिहाड़ जेल के सबसे वरिष्ठ अधिकारी को कोर्ट की सहायता के लिए जरूरी निर्देशों के साथ उपस्थित रहना था। 15 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान, DG (जेल) और प्रधान सचिव (गृह) व्यक्तिगत रूप से मौजूद थे। इसके बाद यह आश्वासन दिया गया कि घटनाक्रम का तारीख-वार विवरण, एक फ्लो चार्ट के रूप में अदालत के समक्ष पेश किया जाएगा।
अदालत ने टिप्पणी की,
"इसके बाद प्रतिवादी से कम से कम यह उम्मीद तो थी कि DG (जेल) या प्रधान सचिव (गृह) इस मामले में शपथ-पत्र (एफिडेविट) दाखिल करेंगे।"
राज्य के वकील ने दिल्ली जेल मुख्यालय, तिहाड़ के अधीक्षक द्वारा दाखिल शपथ-पत्र का हवाला दिया। इस पर अदालत ने कहा कि विशेष सचिव (गृह) सुनवाई शुरू होने के बाद ही वर्चुअल माध्यम से कार्यवाही में शामिल हुए।
अदालत ने यह भी दर्ज किया कि अनुपालन रिपोर्ट देने के मामले में संबंधित अधिकारियों से सहयोग न मिलने के कारण राज्य के वकील को काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा। अदालत ने टिप्पणी की कि अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के प्रति "संवेदनशील" बनाना आवश्यक है।
अदालत ने यह भी गौर किया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को लागू करने के लिए राज्य निगरानी समिति की अब तक केवल "एक बैठक" हुई है, जो 1 सितंबर 2026 को आयोजित की गई। हालांकि इस बैठक की अध्यक्षता दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव ने की थी, लेकिन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की आवश्यकता के अनुसार किसी सक्षम अधिकारी को नामित नहीं किया था।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, निगरानी समिति की अध्यक्षता राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष या उनके द्वारा नामित व्यक्ति को करनी है। इसमें राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के गृह सचिव (या अतिरिक्त सचिव के पद से नीचे न होने वाला कोई नामित अधिकारी) और गृह विभाग द्वारा नामित जेल विभाग का एक वरिष्ठ अधिकारी (जो उप महानिरीक्षक - DIG के पद से नीचे न हो) भी शामिल होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि राज्य सरकारों को अपने नियमों में संशोधन करने के लिए दिए गए कुछ निर्देश अभी तक लागू नहीं किए गए।
कोर्ट ने अधिकारियों के रवैये को "लापरवाह और असंवेदनशील" बताते हुए टिप्पणी की,
"शायद सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी, उनके निर्देशों के पालन की रिपोर्ट देने के मामले में कोई प्रगति नहीं हुई।"
कोर्ट ने कहा कि अब उसके पास दो ही रास्ते बचे हैं: या तो इस मामले को सुप्रीम कोर्ट (जिसने मूल निर्देश जारी किए थे) के पास भेजकर अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाए, या फिर 'कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट' (न्यायालय अवमानना अधिनियम) के तहत वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
इस मौके पर विशेष सचिव (गृह) ने रिकॉर्ड पर पैराग्राफ-वार अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) पेश करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा। उन्होंने बताया कि उन्होंने हाल ही में विभाग का कार्यभार संभाला है। उन्होंने कोर्ट को यह भी भरोसा दिलाया कि 30 अक्टूबर को होने वाली निगरानी समिति (Monitoring Committee) की बैठक में संबंधित वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे और DLSA सचिव की मदद से अनुपालन से जुड़ी जरूरी जानकारी तैयार कर ली जाएगी।
इन आश्वासनों को देखते हुए कोर्ट ने मुख्य सचिव को अवमानना नोटिस जारी करने का अपना फैसला फिलहाल टाल दिया।
दिल्ली सरकार के वकील ने भी कोर्ट को भरोसा दिलाया कि 30 अक्टूबर की बैठक में जेल विभाग और राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहेंगे।
इस मामले की अगली सुनवाई 20 नवंबर को होगी। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि तब तक, 18 नवंबर तक, जवाब कोर्ट के सामने पेश कर दिए जाएं।
Case Title : COURT ON ITS OWN MOTION V/s UNION OF INDIA AND OR