दिल्ली हाईकोर्ट ने हत्या और लूट के 2013 के मामले में 12 साल से अधिक समय से जेल में बंद आरोपी को नियमित जमानत देते हुए कहा कि केवल अपराध की गंभीरता अपने आप में जमानत देने पर पूर्ण रोक नहीं लगा सकती। यदि मुकदमा उचित गति से आगे नहीं बढ़ रहा है और आरोपी के शीघ्र सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन हो रहा है तो लंबे समय तक हिरासत में रखना जमानत पर विचार करने का महत्वपूर्ण आधार है।

जस्टिस पुरुषैंद्र कुमार कौरव ने शिवम गुप्ता की जमानत याचिका मंजूर करते हुए यह टिप्पणी की। आरोपी को जनवरी 2014 में भारतीय दंड संहिता की धाराओं 396, 412 और 120बी के तहत दर्ज FIR के मामले में गिरफ्तार किया गया था।

पुलिस के अनुसार नवंबर 2013 में आरोपी अपने तीन-चार साथियों के साथ एक घर में घुसा था। आरोप है कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता के 14 वर्षीय बेटे को कूरियर देने के बहाने दरवाजा खुलवाया। इसके बाद आरोपियों ने महिला को चाकू की नोक पर बंधक बनाया, उसके नाबालिग बच्चों को एक जगह बंद किया और घर से नकदी तथा आभूषण लेकर फरार हो गए। बाद में महिला मृत पाई गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसकी मौत का कारण हाथ से गला दबाने और दम घुटने को बताया गया ।

आरोपी 5 जनवरी 2014 से लगातार न्यायिक हिरासत में है। 30 मार्च तक वह 12 साल 2 महीने और 25 दिन जेल में बिता चुका है। मामले में अभियोजन पक्ष के कुल 32 गवाहों में से अब तक केवल 15 गवाहों के बयान दर्ज हुए हैं।

हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी पर लगे आरोप गंभीर हैं और उसके आपराधिक पूर्ववृत्त भी हैं। इसके बावजूद कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि गंभीर अपराधों में भी जमानत पर विचार करते समय आरोपी के शीघ्र सुनवाई के संवैधानिक अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के केंद्रीय जांच एजेंसी बनाम के.ए. नजीब मामले के फैसले का भी उल्लेख किया। उसमें कहा गया कि यदि किसी आरोपी को लगातार हिरासत में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के विपरीत जाता है तो संवैधानिक अदालतें जमानत देने की शक्ति रखती हैं।

जस्टिस कौरव ने कहा कि आरोपी पहले ही 12 साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है, जो दोषसिद्धि होने पर धारा 396 के तहत दी जा सकने वाली अधिकतम गैर-मृत्युदंड सजा की अवधि का भी एक बड़ा हिस्सा है।

मुकदमे की धीमी गति पर कोर्ट की गंभीर टिप्पणी

हाईकोर्ट ने मुकदमे की धीमी गति को भी जमानत के लिए महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि 12 साल से अधिक समय बीतने के बावजूद 32 में से केवल 15 अभियोजन गवाहों की ही गवाही हो सकी है। अदालत ने पाया कि देरी का बड़ा कारण आरोपी की ओर से कोई चूक नहीं, बल्कि पुलिस के गवाहों और जांच अधिकारियों का ट्रायल कोर्ट में उपस्थित नहीं होना था।

कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि पुलिस अधिकारी ने चार बार व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने से छूट मांगी, जबकि मामले के मूल जांच अधिकारी पांच बार अदालत में उपस्थित नहीं हुए।

इस पर हाईकोर्ट ने दिल्ली के पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया कि वे सुनिश्चित करें कि जांच अधिकारी और पुलिस गवाह ट्रायल कोर्ट द्वारा तय तारीखों पर अनिवार्य रूप से उपस्थित हों। आदेश की प्रति आवश्यक कार्रवाई के लिए पुलिस आयुक्त को भेजने का भी निर्देश दिया गया।

तीन सह-आरोपियों को पहले ही मिल चुकी है जमानत

कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि चार वयस्क सह-आरोपियों में से तीन को पहले ही नियमित जमानत मिल चुकी है। हालांकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल सह-आरोपियों को मिली जमानत के आधार पर जमानत का अधिकार तय नहीं किया जा सकता, लेकिन लंबे समय से जेल में रहने के स्वतंत्र और महत्वपूर्ण आधार के साथ यह परिस्थिति प्रासंगिक जरूर है।

हाईकोर्ट ने कहा कि सह-आरोपियों के मामले में भूमिका अलग होने पर केवल समानता के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती, लेकिन जब यह परिस्थिति लंबे समय की हिरासत जैसे स्वतंत्र आधार के साथ जुड़ती है, तो इसे जमानत पर विचार करते समय ध्यान में रखा जाना चाहिए।

इस आधार पर कोर्ट ने शिवम गुप्ता को नियमित जमानत प्रदान की।

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