फ्री लीगल एड उपलब्ध होना, पसंद के वकील के जरिए SLP दाखिल करने की इच्छा रखने वाले दोषी को पैरोल देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि जेल में मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध होने के आधार पर उस दोषी को पैरोल देने से इनकार नहीं किया जा सकता जो अपनी दोषसिद्धि (conviction) को सुप्रीम कोर्ट में अपनी पसंद के वकील के जरिए चुनौती देना चाहता है।
जस्टिस मिनी पुष्करणा ने कहा कि कैदी का सुप्रीम कोर्ट में 'स्पेशल लीव पिटिशन' (SLP) दाखिल करके कानूनी उपाय खोजने का अधिकार महत्वपूर्ण अधिकार है। इसे केवल इसलिए नहीं छीना जा सकता कि जेल में मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध है या वहां से याचिका दाखिल की जा सकती है।
कोर्ट ने बताया कि 'दिल्ली जेल नियम, 2018' के नियम 1208 (viii) के अनुसार, एक कैदी को सुप्रीम कोर्ट में SLP दाखिल करने के उद्देश्य से पैरोल पाने का अधिकार है। यह SLP हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ हो सकती है, जिसमें उसे दोषी ठहराया गया हो या उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया हो।
कोर्ट ने कहा,
"सिर्फ इसलिए कि मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध है, याचिकाकर्ता को अपनी पसंद का वकील रखने के महत्वपूर्ण अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। वह इस अधिकार का उपयोग इस कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने के लिए SLP दाखिल करने हेतु कर सकता है, जिसमें उसकी दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा गया।"
कोर्ट ने यह टिप्पणी महेंद्र राठौर को 30 दिन की पैरोल देते समय की। राठौर को बलात्कार के मामले में सात साल और आपराधिक धमकी देने के मामले में तीन साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई, और ये दोनों सजाएं एक साथ चल रही हैं।
राठौर ने हाईकोर्ट के 05 अगस्त के उस फैसले को चुनौती देने के लिए SLP दाखिल करने की खातिर पैरोल मांगी, जिसमें उसकी अपील खारिज की गई। उसने वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था करने और वकीलों से सलाह लेने के लिए पैरोल की मांग की।
दिल्ली सरकार ने उसकी पैरोल अर्जी यह कहते हुए खारिज की थी कि वह आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आता है, इसलिए वह जेल में कैदियों के लिए उपलब्ध मुफ्त कानूनी सहायता और मदद ले सकता है।
राठौर को राहत देते हुए कोर्ट ने 'बिजेंद्र बनाम दिल्ली राज्य' (State of NCT of Delhi) मामले में अपने पिछले फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देने के दोषी के अधिकार को केवल इसलिए नहीं नकारा जा सकता कि जेल में मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध है या वहां से SLP दाखिल की जा सकती है। पहले के फैसलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि एक दोषी को अपनी पसंद के वकील के जरिए सुप्रीम कोर्ट में कानूनी उपाय अपनाने का मौका दिया जाना चाहिए।
इसके अनुसार, कोर्ट ने राठौर की याचिका स्वीकार कर ली और उसे रिहाई की तारीख से 30 दिनों की पैरोल दी, ताकि वह कुछ शर्तों के साथ SLP (विशेष अनुमति याचिका) दाखिल कर सके।
Case Title : Mahender Rathore v. State (NCT of Delhi)