दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई विधवा बहू अपनी कमाई, संपत्ति या अपने दिवंगत पति की संपत्ति से अपना खर्च नहीं उठा सकती तो उसके ससुर का यह "पवित्र कर्तव्य" है कि वह उसका खर्च उठाए।

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (HAMA) के तहत कानूनी व्यवस्था विधवा बहू को भरण-पोषण पाने की हकदार मानती है, जिसमें रहने की जगह और आश्रय भी शामिल है।

कोर्ट एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रहा था, जिसमें एक दिवंगत व्यक्ति के कानूनी प्रतिनिधियों ने एक आदेश के खिलाफ अपील की थी। इस आदेश में उन्हें पश्चिम विहार की एक संपत्ति खाली करने और 'मेस्ने प्रॉफिट' (संपत्ति के अनधिकृत कब्जे के दौरान उससे हुई आय) का भुगतान करने के लिए कहा गया।

दिवंगत व्यक्ति अपनी पत्नी और बेटियों के साथ उस संपत्ति में रह रहा था। मुकदमे के दौरान उसकी मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसकी विधवा और दो बेटियों को उसके कानूनी प्रतिनिधियों के तौर पर रिकॉर्ड में शामिल किया गया। वे उस संपत्ति में रहना जारी रखती रहीं।

ससुर, जो उस संपत्ति का मालिक है, उसने उन्हें वहां से बेदखल करने की मांग की। विधवा का तर्क है कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत वह संपत्ति उसका "साझा घर" (Shared Household) है और उसे वहां रहने का स्वतंत्र अधिकार है।

कोर्ट ने माना कि वह संपत्ति वास्तव में विधवा का साझा घर है और पति की मृत्यु से उसके रहने का अधिकार खत्म नहीं हुआ।

कोर्ट ने HAMA की धारा 19 की जांच की, जिसमें कानूनी शर्तों के अधीन ससुर द्वारा विधवा बहू के भरण-पोषण का प्रावधान है।

कोर्ट ने गौर किया कि HAMA की धारा 3(b) में "भरण-पोषण" को परिभाषित करते हुए कहा गया कि इसमें भोजन, कपड़े, रहने की जगह, शिक्षा और चिकित्सा देखभाल व इलाज की व्यवस्था शामिल है। इसलिए यह दायित्व केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आश्रय की व्यवस्था भी शामिल है। कंचना राय बनाम गीता शर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि धारा 19 ससुर पर यह ज़िम्मेदारी डालती है कि वह अपनी विधवा बहू का जीवन भर भरण-पोषण करे।

इसके बाद कोर्ट ने कहा:

“बेटे की मौत के बाद ससुर का यह पवित्र कर्तव्य है कि वह विधवा बहू का भरण-पोषण करे, अगर वह खुद या अपने मृत पति की छोड़ी हुई संपत्ति से अपना गुज़ारा करने में असमर्थ है। इस तरह HAMA (हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम) का कानूनी ढांचा विधवा बहू को भरण-पोषण (जिसमें रहने की जगह भी शामिल है) पाने का हकदार मानता है, बशर्ते वह अधिनियम में बताए गए स्रोतों से अपना गुज़ारा करने में असमर्थ हो।”

ससुर की मौत होने पर HAMA की धारा 21 और 22 लागू होती हैं, जिनके तहत मृत हिंदू के उत्तराधिकारी मृत व्यक्ति से विरासत में मिली संपत्ति से उसके आश्रितों का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य होते हैं।

साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विधवा के रहने के अधिकार का मतलब यह नहीं है कि संपत्ति के मालिक का कब्ज़ा वापस पाने का अधिकार पूरी तरह से खत्म हो जाता है।

कोर्ट ने कहा कि मालिक के तौर पर ससुर के अधिकारों और विधवा बहू के रहने के अधिकार के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है।

इस मामले में ससुर विवादित संपत्ति में नहीं रह रहे हैं, जबकि विधवा अपनी बेटियों के साथ वहाँ दो दशकों से ज़्यादा समय से रह रही है। उसके पास रहने के लिए कोई दूसरी जगह उपलब्ध नहीं है।

इसलिए कोर्ट ने कब्ज़े के आदेश को तो बरकरार रखा, लेकिन यह निर्देश दिया कि इसे तब तक लागू नहीं किया जा सकता, जब तक ससुर या तो विधवा के लिए उसी इलाके या आस-पास के इलाके में रहने के लिए कोई उपयुक्त वैकल्पिक जगह (जो उसे पहले मिल रही सुविधा के बराबर हो) का इंतज़ाम न कर दें, या फिर उसे किराए के तौर पर ₹15,000 प्रति माह न दें।

कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा नुकसान/मेस्ने प्रॉफ़िट (संपत्ति के अनधिकृत उपयोग से होने वाली आय) के तौर पर ₹10,000 प्रति माह देने के आदेश को भी रद्द किया।

Case Title : R v. A

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