दिल्ली हाईकोर्ट ने कॉपीराइट टाइटल के दावे पर 'दिल्ली लॉ हाउस' को 47 लॉ बुक्स बेचने से रोकने से इनकार किया
दिल्ली हाईकोर्ट ने 'दिल्ली लॉ हाउस' और उससे जुड़ी संस्थाओं या लोगों को 47 लॉ बुक्स पब्लिश करने और बेचने से रोकने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि केस करने वाली शक्ति सागर इन कामों पर अपना शुरुआती (Prima Facie) कॉपीराइट अधिकार साबित करने में नाकाम रहीं।
जस्टिस पुरषेंद्र कुमार कौरव, सागर द्वारा दायर केस की सुनवाई कर रहे थे। सागर ने 47 टाइटल्स पर एक्सक्लूसिव कॉपीराइट का दावा किया था और आरोप लगाया कि 'दिल्ली लॉ हाउस' समेत प्रतिवादी (Defendants) उनकी इजाज़त के बिना किताबें पब्लिश और बेच रहे थे।
वादी (Plaintiff), जो स्वर्गीय सुभाष सागर की पत्नी और स्वर्गीय आर.जी. सागर की बहू हैं, ने दावा किया कि उन्हें कॉपीराइट का अधिकार अपने ससुर और पति से मिला है। उन्होंने 1962 के एक सर्टिफिकेट, 1995 में आर.जी. सागर द्वारा बनाई गई वसीयत और 2021 में उनके पति द्वारा बनाई गई वसीयत का हवाला दिया।
उन्होंने आरोप लगाया कि जहां 'दिल्ली लॉ हाउस' (DLH) को टाइटल्स पब्लिश करने की इजाज़त थी, वहीं एक दूसरी संस्था 'द दिल्ली लॉ हाउस' (TDLH) उनके लाइसेंस के बिना उन्हें पब्लिश और बेच रही थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि TDLH, DLH की जगह (Premises), डोमेन नेम और ईमेल आईडी का इस्तेमाल कर रही थी।
प्रतिवादियों ने उनके कॉपीराइट दावे को चुनौती दी। उनका तर्क था कि किताबें अलग-अलग लेखकों ने लिखी थीं और वादी ने उन लेखकों से 'M/s लॉ बुक कंपनी' या स्वर्गीय आर.जी. सागर के पक्ष में कोई असाइनमेंट डॉक्यूमेंट पेश नहीं किया।
उन्होंने 1962 के सर्टिफिकेट पर भी सवाल उठाए और कहा कि इसमें असली लेखकों द्वारा कॉपीराइट के किसी असाइनमेंट का ज़िक्र नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि कॉपीराइट एक्ट की धारा 17 के तहत, लेखक ही कॉपीराइट का पहला मालिक होता है, जबकि लेखक के अलावा कोई अन्य व्यक्ति धारा 18 के तहत असाइनमेंट या कानून द्वारा मान्यता प्राप्त ट्रांसमिशन के ज़रिए अधिकार (Title) हासिल कर सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि धारा 19(1) के अनुसार, कॉपीराइट का असाइनमेंट लिखित रूप में होना चाहिए और उस पर असाइनर या उनके अधिकृत एजेंट के हस्ताक्षर होने चाहिए। कोर्ट ने देखा कि जिन किताबों की बात हो रही है, उन पर उनके लेखकों के नाम लिखे थे और वादी (Plaintiff) एक असाइनी (Assignee) के दूर के उत्तराधिकारी के तौर पर कॉपीराइट का दावा कर रहा था।
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि वादी ने यह नहीं बताया कि M/s लॉ बुक कंपनी ने खुद लेखकों से कॉपीराइट कैसे हासिल किया।
कोर्ट ने कहा,
"इसलिए इस स्टेज पर वादी के मालिकाना हक की शुरुआत (Root of Title) का पता नहीं चलता है।"
कोर्ट ने आगे कहा कि जिन दो वसीयतों (Wills) का हवाला वादी ने दिया, वे इस कमी को पूरा नहीं कर सकतीं। कोर्ट ने गौर किया कि वसीयत करने वाले दोनों में से कोई भी उन रचनाओं का लेखक नहीं था और पहले वसीयतकर्ता का मालिकाना हक भी साबित नहीं हुआ।
कोर्ट ने कहा,
"दोनों वसीयतों पर गंभीर विवाद है। 17.10.1995 की वसीयत के निष्पादन (Execution) और वसीयतकर्ता के हस्ताक्षर से इनकार किया गया। शिकायत में इसे रजिस्टर्ड वसीयत बताया गया, जबकि प्रतिवादी (Defendant) नंबर 1 से 4 का कहना है कि इस पर रजिस्ट्रेशन का कोई एंडोर्समेंट नहीं है।"
कोर्ट ने कहा,
"वसीयत का लाभार्थी (Legatee) केवल वही पाता है जो वसीयतकर्ता के पास था।"
कोर्ट ने आगे कहा कि कॉपीराइट पर वादी का दावा विवादित वसीयत दस्तावेजों पर टिका था, जबकि लेखकों से असाइनमेंट के ज़रिए मिले मालिकाना हक की शुरुआत का पता नहीं चला था।
कोर्ट ने वादी के उस तर्क को भी खारिज कर दिया कि कॉपीराइट उल्लंघन के मामलों में आमतौर पर निषेधाज्ञा (Injunction) जारी की जाती है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे सिद्धांत के लिए यह ज़रूरी है कि वादी ने कम से कम प्रथम दृष्टया (Prima Facie) कॉपीराइट पर अपना मालिकाना हक साबित किया हो।
Case Title : Mrs. Shakti Sagar v. The Delhi Law House & Ors.