भर्ती विज्ञापन में हुई गलती से नियुक्ति का अधिकार नहीं बनता, जब पद ही उपलब्ध न हो: दिल्ली हाइकोर्ट

Update: 2026-01-22 06:29 GMT

दिल्ली हाइकोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) का आदेश रद्द कर दिया, जिसमें एक अभ्यर्थी को गलत भर्ती विज्ञापन के आधार पर नियुक्ति देने का निर्देश दिया गया था, जबकि संबंधित आरक्षित श्रेणी में कोई वास्तविक रिक्ति ही मौजूद नहीं थी।

जस्टिस अनिल क्षेतरपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने कहा कि भर्ती अधिसूचना में हुई अनजानी गलती से किसी उम्मीदवार को नियुक्ति का स्थायी या वैधानिक अधिकार नहीं मिल सकता, जब वास्तव में कोई स्वीकृत पद उपलब्ध ही न हो।

हाइकोर्ट राष्ट्रीय क्षयरोग एवं श्वसन रोग संस्थान द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था।

इस याचिका में संस्थान ने CAT के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग की एक उम्मीदवार को राहत दी गई।

मामले की पृष्ठभूमि

भर्ती प्रक्रिया हिंदुस्तान लाइफ केयर लिमिटेड नामक आउटसोर्स एजेंसी के माध्यम से की जानी थी। संस्थान में एचएमटीएस डायटरी (रसोई स्टाफ) के पदों के लिए जारी भर्ती विज्ञापन में गलती से कुल 10 पद दिखाए गए, जिनमें 3 पद एससी श्रेणी के बताए गए।

बाद में यह स्पष्ट किया गया कि वास्तव में एससी श्रेणी के लिए कोई पद उपलब्ध नहीं था। वास्तविक रिक्तियां 5 अनारक्षित (यूआर), 3 अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), 1 अनुसूचित जनजाति (एसटी) और 1 आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए थीं।

CAT ने इस आधार पर निर्णय दिया था कि विज्ञापन में एससी श्रेणी का पद दर्शाया गया और लिखित परीक्षा में प्रथम स्थान पाने वाली उम्मीदवार को नियुक्ति का अधिकार है।

हालांकि, हाइकोर्ट ने इस आदेश को पलटते हुए कहा कि नियुक्ति के लिए स्वीकृत रिक्ति का होना अनिवार्य शर्त है। केवल भर्ती विज्ञापन में हुई गलती के आधार पर कोई भी उम्मीदवार नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता।

कोर्ट ने कहा,

“भले ही भर्ती सूचना जारी करने में त्रुटि हुई हो, लेकिन जब आज तक एससी श्रेणी के लिए कोई रिक्ति उपलब्ध नहीं है, तब यह गलती प्रत्यर्थी के पक्ष में नियुक्ति का अधिकार उत्पन्न नहीं करती।”

हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्यर्थी केवल भर्ती विज्ञापन में हुई गलती के आधार पर नियुक्ति की मांग नहीं कर सकती। हालांकि, वह कानून के तहत क्षतिपूर्ति (हर्जाना) की मांग कर सकती है, लेकिन इस मामले में ऐसी कोई मांग नहीं की गई।

उम्र में छूट को लेकर कोर्ट ने कहा कि आयु-छूट तभी दी जा सकती है, जब संबंधित आरक्षित श्रेणी में पद उपलब्ध हो। चूंकि अनारक्षित श्रेणी के तहत उम्मीदवार अधिकतम आयु सीमा पार कर चुकी थी, इसलिए उसे आयु-छूट का लाभ भी नहीं मिल सकता।

इन सभी कारणों से हाइकोर्ट ने कैट का आदेश रद्द कर दिया, लेकिन प्रत्यर्थी को कानून के तहत क्षतिपूर्ति मांगने की स्वतंत्रता दी।

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