दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को बॉलीवुड एक्टर सनी देओल की आगामी फिल्म 'सूर्या: अंत से आरंभ तक' की सिनेमाघरों में रिलीज पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार किया। फिल्म 20 नवंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है।
कार्यवाहक चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव सांब्रे और जस्टिस संजय शर्मा की खंडपीठ ने कहा,
“हमें मौजूदा जनहित याचिका पर सुनवाई करने का कोई कारण नजर नहीं आता।”
कोर्ट ने कहा कि इसी तरह की एक याचिका पहले से सिंगल जज के समक्ष लंबित है, जिस पर 16 नवंबर को सुनवाई होनी है। ऐसे में समान मुद्दे पर एक से अधिक कार्यवाही चलाने की कोई आवश्यकता नहीं है।
खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं को सिंगल जज के समक्ष लंबित कार्यवाही में शामिल होने की अनुमति दी। कोर्ट ने उन्हें संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपने प्रतिवेदन पर आगे कार्रवाई करने की छूट भी दी।
यह जनहित याचिका डॉ. नचिकेता भाटिया और डॉ. ध्रुव चौहान ने दायर की थी। याचिकाकर्ताओं ने फिल्म की रिलीज को चुनौती देते हुए आरोप लगाया कि इसके आधिकारिक ट्रेलर में मेडिकल कर्मियों के खिलाफ शारीरिक हिंसा को वीरतापूर्ण तरीके से दिखाया गया। उनका यह भी कहना था कि फिल्म स्वास्थ्य सेवा पेशे में भ्रष्टाचार को अनुचित रूप से सामान्यीकृत करती है।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, फिल्म का कथित चित्रण सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 की धारा 5बी का उल्लंघन करता है और सार्वजनिक कानून-व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर सकता है।
याचिका में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) को फिल्म के कथित आपत्तिजनक दृश्यों और संवादों की जांच करने तथा जरूरत पड़ने पर उन्हें संशोधित या हटाने का निर्देश देने की मांग की गई।
इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं ने फिल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग पर वैधानिक जांच पूरी होने तक अंतरिम और एकपक्षीय रोक लगाने की मांग भी की थी। याचिका वकील सत्यम सिंह राजपूत और नीमा के माध्यम से दायर की गई।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि यह मुद्दा संवेदनशील है और जनहित याचिका का दायरा रिट याचिका में होने वाली कार्यवाही से अधिक व्यापक होगा।
CBFC की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि अभी तक फिल्म को प्रमाणन नहीं दिया गया और उसका मामला बोर्ड के समक्ष विचाराधीन है।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने आगे कहा कि फिल्म के टीजर में इस्तेमाल की गई भाषा से ऐसा संदेश जा सकता है कि मरीजों के परिजन अब डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मियों के खिलाफ हिंसा का सहारा ले सकते हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि इस संबंध में अधिकारियों को पहले ही प्रतिवेदन दिया जा चुका है, जिसकी सामग्री जनहित याचिका में उठाए गए मुद्दों के समान है। इसलिए उन्होंने प्रतिवेदन पर निर्णय लेने का अनुरोध किया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि इसी तरह की याचिका पहले से सिंगल जज के समक्ष लंबित होने के कारण वह मौजूदा जनहित याचिका पर सुनवाई करने के इच्छुक नहीं है।