प्रणालीगत विफलता: आजीवन कारावास के दोषी की 13 वर्षों तक गिरफ्तारी न होने पर दिल्ली हाइकोर्ट सख्त, विस्तृत दिशा-निर्देश जारी

Update: 2026-02-04 08:14 GMT

दिल्ली हाइकोर्ट ने हत्या मामले में आजीवन कारावास की सजा पाए दोषी की गिरफ्तारी में 13 वर्षों की देरी पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए इसे आपराधिक न्याय प्रणाली की गंभीर “प्रणालीगत विफलता” करार दिया है।

हाइकोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की घटनाएं न्यायिक आदेशों के प्रवर्तन पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं और आपराधिक न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को कमजोर करती हैं।

जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर दुडेजा की खंडपीठ सोनू नामक दोषी द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसे वर्ष 2009 में हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

हाइकोर्ट ने कहा कि यह उन दुर्लभ और चिंताजनक मामलों में से एक है, जहां दोषी की अपील वर्ष 2012 में खारिज हो जाने के बावजूद वह लगभग 13 वर्षों तक स्वतंत्रता का लाभ उठाता रहा।

अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बताया कि दिसंबर 2010 में दोषी की सजा दो माह के लिए निलंबित की गई, किंतु इसके बाद उसने आत्मसमर्पण नहीं किया। यहां तक कि 19 सितंबर, 2012 को उसकी अपील खारिज हो जाने के बाद भी वह कानून की पकड़ से बाहर रहा। अंततः उसे 13 अक्टूबर 2025 को गिरफ्तार किया गया।

गंभीर टिप्पणियां

हाइकोर्ट ने इस असाधारण देरी पर “गंभीर संज्ञान” लेते हुए कहा कि यह स्थिति ट्रायल कोर्ट, जेल प्रशासन और पुलिस के बीच समन्वय की भारी कमी को दर्शाती है।

अदालत ने कहा कि दोषसिद्धि के बाद निगरानी व्यवस्था में यह चूक न्यायिक आदेशों के प्रवर्तन में विफलता को उजागर करती है।

अदालत ने कहा कि इस प्रकार की लापरवाही आपराधिक न्याय प्रणाली की साख को गहराई से प्रभावित करती है और आम जनता के विश्वास को कमजोर करती है।

भविष्य में ऐसी स्थिति की पुनरावृत्ति रोकने के लिए हाइकोर्ट ने सभी संबंधित प्राधिकरणों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए।

हाइकोर्ट ने निर्देश दिया कि अंतरिम जमानत या सजा निलंबन से संबंधित कोई भी आदेश पारित होते ही न्यायालय की रजिस्ट्री उस आदेश की सूचना तत्काल ट्रायल कोर्ट, जेल अधीक्षक और संबंधित थाना क्षेत्र की पुलिस को देगी।

अदालत ने कहा कि यदि सजा किसी निश्चित अवधि के लिए निलंबित की जाती है तो ट्रायल कोर्ट जमानत बांड स्वीकार करते समय आत्मसमर्पण की तिथि निश्चित रूप से दर्ज करेगा और उस तिथि के तुरंत बाद मामले को सूचीबद्ध करेगा।

हाइकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जेल अधीक्षक का यह कर्तव्य होगा कि वह ट्रायल कोर्ट को सूचित करे कि निर्धारित अवधि समाप्त होने पर दोषी ने आत्मसमर्पण किया है या नहीं, ताकि आगे आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जा सके।

अदालत ने कहा कि यदि दोषी निर्धारित तिथि पर आत्मसमर्पण नहीं करता है और अंतरिम जमानत या सजा निलंबन बढ़ाने का कोई आदेश मौजूद नहीं है तो ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार तत्काल कदम उठाएगा ताकि दोषी को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा सके।

इसके अतिरिक्त, हाइकोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि दोषी की अपील खारिज हो जाती है और वह जमानत पर है, या राज्य अथवा परिवादी की अपील स्वीकार हो जाती है तो जेल अधीक्षक तत्काल ट्रायल कोर्ट को यह जानकारी देगा कि दोषी ने आत्मसमर्पण किया है या नहीं। इसके आधार पर ट्रायल कोर्ट यह सुनिश्चित करेगा कि दोषी को सजा भुगतने के लिए जेल भेजा जाए।

हाइकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि इस आदेश की प्रति सभी आपराधिक अदालतों, जेल महानिरीक्षक तथा पुलिस आयुक्त को भेजी जाए ताकि इन दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जा सके।

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