किरायेदार जिम्मेदारी से नहीं बच सकता, परिवार के रहने पर भी मानी जाएगी उसकी कब्जेदारी: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-03-28 07:37 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि कोई भी किरायेदार यह कहकर अपनी कानूनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि वह खुद किराए के मकान में नहीं रह रहा है। अदालत ने कहा कि यदि उस मकान में उसके परिवार के सदस्य रह रहे हैं, तो उसे ही उस संपत्ति का वैधानिक कब्जाधारी माना जाएगा।

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने अपने फैसले में कहा,

“जब कोई किरायेदार अपने परिवार के साथ रहने के लिए मकान किराए पर लेता है तो परिवार के किसी भी सदस्य द्वारा उस मकान में रहना, किरायेदार का ही वैधानिक कब्जा माना जाएगा। केवल यह कह देने से कि वह खुद वहां नहीं रह रहा, वह अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।”

यह मामला एक मकान मालिक द्वारा दायर वाद से जुड़ा था, जिसमें उसने संपत्ति का कब्जा, बकाया किराया, मुनाफा हानि (मेस्ने प्रॉफिट) और निषेधाज्ञा की मांग की थी। किरायेदार ने मकान मालिक-किरायेदार संबंध और तय किराए को स्वीकार किया, लेकिन यह दावा किया कि जून 2022 से वह उस मकान में नहीं रह रहा है, क्योंकि उसकी अलग रह रही पत्नी ने मकान पर ताला लगाकर अपना कब्जा कर लिया।

हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि पत्नी उस मकान में किरायेदार के परिवार के सदस्य के रूप में आई, इसलिए वह स्वतंत्र रूप से किरायेदारी का दावा नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि मकान मालिक के साथ उसका कोई सीधा अनुबंध नहीं है।

अदालत ने घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 17 के तहत पत्नी के निवास के अधिकार पर भी विचार किया। हालांकि कोर्ट ने पाया कि पत्नी ने केवल मकान पर ताला लगाया और बाद में अपने पिता के घर चली गई।

इस पर अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा,

“यह कानून की प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग है, जहां केवल ताला लगाकर मकान मालिक के अधिकारों को बाधित करने की कोशिश की गई। कानून पत्नी को निवास का संरक्षण देता है लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है और मुख्य रूप से पति तक सीमित है।”

अंत में हाईकोर्ट ने किरायेदार की अपील खारिज की और ट्रायल कोर्ट द्वारा दिया गया बेदखली आदेश बरकरार रखा। साथ ही किरायेदार को बकाया किराया और मुनाफा हानि का भुगतान करने का निर्देश भी दिया गया।

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