दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 368 के तहत किसी व्यक्ति को केवल इस आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि उसने कथित तौर पर अपहरण या बहला-फुसलाकर ले जाए गए व्यक्ति को छिपाया या बंधक बनाकर रखा। अभियोजन पक्ष को यह भी साबित करना होगा कि आरोपी को इस बात की जानकारी थी कि संबंधित व्यक्ति का अपहरण या उसे बहला-फुसलाकर ले जाया गया।

जस्टिस विमल कुमार यादव ने दो आरोपियों की दोषसिद्धि रद्द करते हुए कहा कि मामले में यह आवश्यक तत्व साबित नहीं हुआ कि आरोपियों को महिला के अपहरण या बहला-फुसलाकर ले जाए जाने की जानकारी थी। ऐसे में उनके खिलाफ धारा 368 के तहत दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।

मामला एक युवती की शिकायत से जुड़ा था। युवती ने बुराड़ी थाने में शिकायत देकर आरोप लगाया कि उसे शादी का झांसा देकर दिल्ली लाया गया, बाद में 16 हजार रुपये में बेच दिया गया और देह व्यापार के लिए मजबूर किया गया।

इस मामले में IPC की धारा 363, 372, 373, 376(ग) और 344 के साथ धारा 34 के तहत FIR दर्ज की गई। अभियोजन का आरोप था कि बाद में युवती को आरोपियों के घर लाया गया, जहां उसे बंधक बनाकर रखा गया और देह व्यापार के लिए मजबूर किया गया।

ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को धारा 368 के तहत दोषी ठहराते हुए दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करते हुए आरोपियों ने दलील दी कि ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि उन्हें युवती के अपहरण या उसे बहला-फुसलाकर ले जाने की जानकारी थी।

हाईकोर्ट के समक्ष युवती ने ट्रायल के दौरान अपने बयान में आरोपियों को क्लीन चिट दी। उसने कहा कि उसे उनके घर में ठीक से रखा गया था और उसके साथ कोई गलत काम नहीं किया गया। हालांकि, अभियोजन पक्ष ने उसके पहले पुलिस को दिए बयान, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 164 के तहत दर्ज बयान और डॉक्टर को दी गई जानकारी का हवाला दिया, जिनमें आरोपियों के खिलाफ आरोप लगाए गए।

हाईकोर्ट ने माना कि सुनवाई के दौरान युवती अपने पहले आरोपों से मुकर गई। इसके बाद कोर्ट ने धारा 368 के तहत दोषसिद्धि के लिए आवश्यक तीन तत्वों पर विचार किया। कोर्ट के अनुसार, अभियोजन को पहले यह साबित करना होता है कि व्यक्ति का अपहरण या बहला-फुसलाकर ले जाया गया, दूसरा यह कि आरोपी को इसकी जानकारी थी और तीसरा यह कि ऐसी जानकारी होने के बावजूद आरोपी ने उस व्यक्ति को गलत तरीके से छिपाया या बंधक बनाकर रखा।

कोर्ट ने पाया कि मौजूदा मामले में साक्ष्य यह साबित नहीं करते कि आरोपियों ने युवती को इस जानकारी के बावजूद अपने पास रखा कि वह अपहरण या बहला-फुसलाकर ले जाए जाने की शिकार है।

इस आधार पर हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों के खिलाफ धारा 368 के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखने से इनकार किया और उनकी अपील स्वीकार की।

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