दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार (13 अक्टूबर) को इंडियन यूथ कांग्रेस (IYC) की याचिका पर नोटिस जारी किया। इस याचिका में CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने की इजाज़त मांगने वाली अर्ज़ी पर फिर से विचार करने की मांग की गई। साथ ही, यह भी जांचने को कहा गया है कि क्या सुरक्षा, ट्रैफिक और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं को उचित शर्तों के साथ हल किया जा सकता है या नहीं।

जस्टिस अमित महाजन ने याचिका में की गई तीन मांगों पर नोटिस जारी किया और मामले की सुनवाई नवंबर के लिए तय की।

यह याचिका IYC के अध्यक्ष उदय भानु चिब ने दायर की।

IYC की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि विरोध प्रदर्शन करने की इजाज़त मांगने वाली अर्ज़ी को मनमाने ढंग से खारिज कर दिया गया था। उन्होंने नोटिस जारी करने पर ज़ोर दिया और कहा कि वे दिल्ली पुलिस द्वारा कल (सोमवार) जारी किए गए उस सर्कुलर के आधार पर अपनी मांगों में बदलाव करेंगे, जिसमें जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन के लिए तय जगह की सूची से हटा दिया गया।

हालांकि, ASG शर्मा ने नोटिस जारी करने का विरोध किया और कहा कि पूरी याचिका जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने से जुड़ी है।

ASG ने कहा,

"बाकी सभी मांगें उसी मुख्य मांग से जुड़ी हैं। हमने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद इसे (जंतर-मंतर को) तय प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाया।"

ASG ने पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का ज़िक्र किया, जिसमें केंद्र से यह विचार करने को कहा गया कि क्या जंतर-मंतर की जगह शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए कोई दूसरी जगह तय की जानी चाहिए। कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों के लिए ज़रूरी सुविधाओं वाली वैकल्पिक जगह की पहचान करने के सुझाव पर यह बात कही थी।

विरोध प्रदर्शन या रैलियां आयोजित करने के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और CBD ग्राउंड (पूर्वी दिल्ली) को नई जगहों के तौर पर तय किया गया।

ASG ने कहा कि जब तक याचिकाकर्ता जगह को हटाने (डी-नोटिफिकेशन) के आदेश को चुनौती नहीं देता, तब तक यह याचिका टिक नहीं सकती।

वहीं, लूथरा ने कहा कि उन्हें विरोध प्रदर्शन करने पर लगाई गई शर्तों से दिक्कत है।

उन्होंने कहा,

"यह आदेश बिना किसी ठोस कारण के दिया गया। यह पूरी तरह से बेबुनियाद है। मेरा कहना है कि 2022 के आदेश में लगाई गई शर्तें, जो अभी भी लागू हैं, कानून के नज़रिए से गलत हैं।"

इसके बाद कोर्ट ने याचिका में की गई तीन मांगों (c, d और f) पर नोटिस जारी किया और मामले की सुनवाई के लिए 17 नवंबर की तारीख तय की।

मांग (c) के ज़रिए, याचिका में यह घोषणा करने की अपील की गई कि 2022 के स्टैंडिंग ऑर्डर का इस्तेमाल शांतिपूर्ण सभाओं पर अपने-आप या ज़रूरत से ज़्यादा रोक लगाने के लिए नहीं किया जा सकता, जब तक कि हर मामले की अलग-अलग जांच न की जाए और कम पाबंदी वाले नियमों पर विचार न किया जाए।

याचिका में 2022 के स्टैंडिंग ऑर्डर (SO 48) को इस हद तक चुनौती दी गई कि एक अंदरूनी प्रशासनिक निर्देश को अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत मिले अधिकारों पर रोक लगाने की स्वतंत्र शक्ति का स्रोत माना जाता है, जबकि इसके लिए कोई कानूनी संवैधानिक या वैधानिक आधार नहीं है और न ही स्टैंडिंग ऑर्डर में बताई गई अलग-अलग मामलों की जांच की प्रक्रिया अपनाई गई।

मांग (d) में अधिकारियों को निर्देश देने की अपील की गई कि वे IYC की अर्ज़ी पर नए सिरे से ठोस वजहों के साथ और हर मामले की अलग-अलग जांच करते हुए फिर से विचार करें और देखें कि क्या सुरक्षा, ट्रैफ़िक और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं को उचित शर्तों के ज़रिए हल किया जा सकता है।

मांग (f) के ज़रिए, याचिका में यह घोषणा करने की अपील की गई कि 10 दिन पहले अर्ज़ी देने की शर्त को पूरी तरह से अनिवार्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि 2022 का स्टैंडिंग ऑर्डर खुद कम समय में दी गई अर्ज़ियों पर विचार करने की गुंजाइश रखता है, बशर्ते जगह उपलब्ध हो और ज़रूरी इंतज़ाम करने के लिए काफ़ी समय हो।

याचिका में तर्क दिया गया कि पुलिस शांतिपूर्ण सभा को नियंत्रित करने की अपनी शक्ति का इस्तेमाल उसे रोकने की शक्ति के तौर पर नहीं कर सकती, जब तक कि हर मामले की अलग-अलग और उचित जांच न की जाए।

IYC ने 25 सितंबर को दिल्ली पुलिस के पास लगभग 100-150 लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए अर्ज़ी दी थी।

ऐसा करते समय उसने सुरक्षा, ट्रैफ़िक, अनुशासन और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी सभी कानूनी शर्तों का पालन करने का भरोसा दिलाया।

हालांकि, याचिका में कहा गया कि बार-बार फॉलो-अप करने के बावजूद, अर्ज़ी नामंज़ूर करने की जानकारी 1 अक्टूबर को दी गई, जो प्रदर्शन के लिए प्रस्तावित पहली तारीख थी।

याचिका में भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a) और 19(1)(b) का हवाला दिया गया और प्रदर्शन से जुड़े दिशा-निर्देशों को बिना सोचे-समझे लागू करने के तरीके को चुनौती दी गई।

इसमें सुप्रीम कोर्ट के उन तय फैसलों का भी सहारा लिया गया, जो शांतिपूर्ण सभा के अधिकार की रक्षा करते हैं और उचित नियमों की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं। यह याचिका वकील रूपेश सिंह भदौरिया के ज़रिए दायर की गई।

Case Title : Uday Bhanu Chib v. UOI & Ors

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