हाईकोर्ट के बाहर की सड़कें भी पार्किंग के लिए इस्तेमाल हो रही हैं: फुटपाथों पर अतिक्रमण की PIL पर दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी
दिल्ली हाईकोर्ट ने राजधानी में फुटपाथों से अतिक्रमण हटाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि हाईकोर्ट के बाहर की सड़कें भी पार्किंग के लिए इस्तेमाल हो रही हैं।
एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव सांब्रे ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा,
“आप फुटपाथों की बात कर रहे हैं? यहां सड़कों का भी इस्तेमाल पार्किंग के लिए हो रहा है। हाईकोर्ट के बाहर जाकर देखिए पार्किंग की वजह से चार लेन घिरी हुई मिलेंगी। यह आपके ही साथी वकीलों की वजह से है।”
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि जयपुर हाउस से दिल्ली हाईकोर्ट तक के रास्ते पर फुटपाथ का इस्तेमाल वाहनों की पार्किंग के लिए किया जा रहा है। इसके कारण पैदल चलने वालों को आने-जाने में परेशानी होती है।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का भी हवाला दिया जिसमें फुटपाथ पर चलने के पैदल यात्रियों के मौलिक अधिकार को मान्यता दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वाहन चालक पैदल यात्रियों के इस अधिकार को खत्म नहीं कर सकते। कोर्ट ने पैदल चलने वालों के लिए बुनियादी ढांचे की सुरक्षा के महत्व पर भी जोर दिया था।
सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक सड़कों और सरकारी जमीन पर अतिक्रमण से जुड़े मामले पहले से ही अदालत में लंबित हैं।
इस संबंध में बेंच ने 20 सितंबर 2018 को रिट याचिका संख्या 1807/2018 में पारित आदेश का उल्लेख किया।
2018 के इस आदेश में दिल्लीभर में अवैध निर्माण और अतिक्रमण से संबंधित कई याचिकाओं पर विचार किया गया। इनमें फुटपाथों पर किए गए अतिक्रमण भी शामिल थे।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की ओर से गठित स्पेशल टास्क फोर्स का भी जिक्र किया था। लगभग 15 सदस्यों वाली इस टास्क फोर्स को अवैध निर्माण और अतिक्रमण से जुड़े मामलों पर कार्रवाई करने की जिम्मेदारी दी गई।
हाईकोर्ट ने उस समय कहा था कि ऐसी शिकायतों के समाधान के लिए व्यवस्था पहले से मौजूद है। इसके बाद याचिकाकर्ताओं को संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी शिकायतें रखने की छूट दी गई।
मौजूदा मामले में जस्टिस संजय शर्मा भी शामिल खंडपीठ ने निर्देश दिया कि 20 सितंबर 2018 के आदेश की प्रति याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराई जाए। याचिकाकर्ता ने आदेश का अध्ययन करने के लिए समय मांगा।
अदालत ने मामले को तीन सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।