अप्रयुक्त भ्रूण को निसंतान दंपतियों द्वारा गोद लेने पर रोक के खिलाफ याचिका पर दिल्ली हाइकोर्ट ने जारी किया नोटिस

Update: 2026-01-28 10:57 GMT

दिल्ली हाइकोर्ट ने निसंतान दंपतियों द्वारा किसी अन्य दंपति के अप्रयुक्त जमे हुए भ्रूण को गोद लेने पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया। यह याचिका सहायक प्रजनन तकनीक (विनियमन) अधिनियम, 2021 के तहत भ्रूण दान पर लगी रोक को असंवैधानिक बताते हुए दायर की गई।

बुधवार को मुख्य जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अधिनियम की धारा 28 के दायरे का विस्तार चाहता है, जो मानव गैमीट और भ्रूण के भंडारण तथा उपयोग को नियंत्रित करती है।

याचिका एक आईवीएफ और बांझपन विशेषज्ञ द्वारा दायर की गई है, जिसमें अधिनियम की धारा 25(2), 27(5), 28(2), 29 और नियम 13(1)(ए) को चुनौती दी गई। याचिका में कहा गया कि इन प्रावधानों के संयुक्त प्रभाव से भ्रूण गोद लेने पर रोक लग जाती है, जबकि अधिनियम दोहरे दाता आईवीएफ प्रक्रिया की अनुमति देता है।

याचिका में तर्क दिया गया कि भ्रूण गोद लेना वस्तुतः और प्रभाव में दोहरे दाता आईवीएफ से अलग नहीं है, क्योंकि दोनों ही स्थितियों में इच्छुक माता-पिता का बच्चे से कोई आनुवंशिक संबंध नहीं होता, फिर भी विधिक अभिभावकत्व उन्हें ही प्राप्त होता है। ऐसे में भ्रूण गोद लेने को अलग तरीके से देखने का कोई तर्कसंगत आधार नहीं है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मनमाना और भेदभावपूर्ण है।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि संतान प्राप्ति से संबंधित निर्णय, जिसमें बच्चा पैदा करने या न करने का अधिकार शामिल है, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन, गरिमा, स्वायत्तता और निजता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। मेडिकल रूप से स्वीकृत और नैतिक रूप से नियंत्रित प्रजनन विकल्प से वंचित करना न केवल प्रजनन स्वतंत्रता में अनुचित हस्तक्षेप है, बल्कि इससे निसंतान दंपतियों को गहरा मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक आघात भी पहुंचता है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने दलील दी कि अधिनियम का उद्देश्य सहायक प्रजनन तकनीक के व्यावसायिक दुरुपयोग को रोकना है। हालांकि, परोपकारी आधार पर भ्रूण दान पर पूर्ण प्रतिबंध इस उद्देश्य के विपरीत है और यह एक विधायी उलझन को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि जब कानून परोपकारी शुक्राणु और अंडाणु दान की अनुमति देता है तो उसी सिद्धांत पर भ्रूण दान को प्रतिबंधित करना अधिनियम के भीतर ही एक विरोधाभास उत्पन्न करता है। उनके अनुसार, यह एक विधायी चूक प्रतीत होती है।

सीनियर एडवोकेट ने यह भी बताया कि इसी तरह की एक याचिका वर्ष 2024 में भी दायर की गई, जिसमें हाइकोर्ट ने याचिकाकर्ता को सरकार के समक्ष प्रतिवेदन देने का निर्देश दिया था। संबंधित प्राधिकरणों की प्रतिक्रिया से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने पुनः हाइकोर्ट का रुख किया।

मामले की सुनवाई के बाद हाइकोर्ट ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय सहायक प्रजनन तकनीक एवं सरोगेसी बोर्ड को नोटिस जारी करते हुए छह सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

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